हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context२५६ हितोपदेशः [संधिः १०३- इसलिये महाराज ! शक्तिके अनुसार उसके सत्कारके लिये रत्नोंकी भेट आदि सामग्री अच्छे प्रकारसे तयार कीजिये । फिर ऐसा करने पर उस गिद्ध मंत्रीको गढ़के द्वारसे चक्रवेने पास जा कर आदरपूर्वक लिवा ला कर राजाका दर्शन कराया. और वह दिये हुए आसन पर बैठ गया। फिर चकवा बोला-'सब तुम्हारे आधीन है । अपनी इच्छानुसार इस राज्यको भोगिये ।' राजहंसने कहा- 'हां, ठीक है ।' दूरदर्शी बोला-'हां, यह ऐसेही हो । परन्तु अब बहुत प्रपञ्चकी बात वृथा है. यतः,- लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा । मूर्खं छन्दानुरोधेन याथातथ्येन पण्डितम् ॥ १०३ ॥ क्योंकि-लोभीको धनसे, अभिमानीको हाथ जोड़ कर, मूर्खको उसका मनोरथ पूरा करके और पण्डितको सच सच कह कर वशमें करना चाहिये ॥ १०३ ॥ अन्यच्च,- सद्भावेन हरेन्मित्रं संभ्रमेण तु बान्धवान् । स्त्री-भृत्यौ दानमानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरान्जनान् ॥ १०४ ॥ और दूसरे-विनयसे मित्रको, मीठी बातोंसे बांधवोंको, दान तथा मानसे स्त्री और सेवकोंको तथा चतुरतासे अन्य लोगोंको वशमें करना चाहिये ॥१०४॥ तदिदानीं संधाय गम्यताम् । महाप्रतापश्चित्रवर्णो राजा ।' चक्र- वाको ब्रूते-'यथा संधानं कार्यं तदप्युच्यताम् ।' राजहंसो ब्रूते-'कति प्रकाराः संधीनां संभवन्ति ?' इसलिये अब मेलके लिये चलिये, चित्रवर्ण राजा बड़ा प्रतापी है । चकवा बोला-'जैसे मेल करना चाहिये सोभी तो कहिये ।' राजहंस बोला-'संधियां कितने प्रकारकी हैं ?' गृध्रो ब्रूते-'कथयामि, श्रूयताम्,- गिद्ध बोला-'कहता हूं । सुनिये,- बलीयसाऽभियुक्तस्तु नृपो नान्यप्रतिक्रियः । आपन्नः संधिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम् ॥ १०५ ॥