हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
Page 277 of 302
Read in context-१११ ] सोलह सन्धि कथन २५७ सबल शत्रुके साथ जिसने युद्ध कर रक्खा है और संधिको छोड़ और कोई जिसका उपाय नहीं, ऐसी आपत्तिमें गिर कर समय व्यतीत करते हुये राजाको संधिकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥ १०५ ॥ कपाल उपहारश्च संतानः संगतस्तथा । उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ॥ १०६ ॥ और कपाल, उपहार, संतान, संगत, उपन्यास, प्रतीकार, संयोग, पुरुषां- तर, ॥१०६ ॥ अदृष्टनर आदिष्ट आत्मादिष्ट उपग्रहः । परिक्रयस्तथोच्छिन्नस्तथा च परभूषणः ॥ १०७ ॥ अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मादिष्ट, उपग्रह, परिक्रय, उच्छिन्न, और पर- भूषण, ॥ १०७ ॥ स्कन्धोपनेयः संधिश्च षोडशैते प्रकीर्तिताः । इति षोडशकं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १०८ ॥ स्कंधोपनेय, यह सोलह प्रकारकी संधि कही गई है और संधिके जानने वाले इन्हींको सोलह संधि करते हैं ॥ १०८ ॥ कपालसंधिर्विज्ञेयः केवलं समसंधितः । संप्रदानाद्भवति य उपहारः स उच्यते ॥ १०९ ॥ केवल समान वालेके साथ मेल करनेको “कपालसंधि” कहते हैं, और जो धन देनेसे होती है वह “उपहारसंधि” कहलाती है ॥ १०९ ॥ संतानसंधिर्विज्ञेयो दारिकादानपूर्वकः । सद्भिस्तु संगतः संधिर्मैत्रीपूर्व उदाहृतः ॥ ११० ॥ कन्यादान देनेसे जो हो उसे “सन्तानसंधि” जाननी चाहिये और सज्जनोंके साथ मित्रतापूर्वक मेल करनेको “संगतसंधि” कहते हैं ॥ ११० ॥ यावदायुःप्रमाणस्तु समानार्थप्रयोजनः । संपत्तौ वा विपत्तौ वा कारणैर्यो न भिद्यते ॥ १११ ॥ जितना अवस्थाका प्रमाण है, तब तक समान धनसे युक्त रहे और संपत्ति या विपत्तिमें अनेक कारणोंसेभी नहीं टूटे ॥ १११ ॥ हि० १७