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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages
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-१११ ] सोलह सन्धि कथन २५७ सबल शत्रुके साथ जिसने युद्ध कर रक्खा है और संधिको छोड़ और कोई जिसका उपाय नहीं, ऐसी आपत्तिमें गिर कर समय व्यतीत करते हुये राजाको संधिकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥ १०५ ॥ कपाल उपहारश्च संतानः संगतस्तथा । उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ॥ १०६ ॥ और कपाल, उपहार, संतान, संगत, उपन्यास, प्रतीकार, संयोग, पुरुषां- तर, ॥१०६ ॥ अदृष्टनर आदिष्ट आत्मादिष्ट उपग्रहः । परिक्रयस्तथोच्छिन्नस्तथा च परभूषणः ॥ १०७ ॥ अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मादिष्ट, उपग्रह, परिक्रय, उच्छिन्न, और पर- भूषण, ॥ १०७ ॥ स्कन्धोपनेयः संधिश्च षोडशैते प्रकीर्तिताः । इति षोडशकं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १०८ ॥ स्कंधोपनेय, यह सोलह प्रकारकी संधि कही गई है और संधिके जानने वाले इन्हींको सोलह संधि करते हैं ॥ १०८ ॥ कपालसंधिर्विज्ञेयः केवलं समसंधितः । संप्रदानाद्भवति य उपहारः स उच्यते ॥ १०९ ॥ केवल समान वालेके साथ मेल करनेको “कपालसंधि” कहते हैं, और जो धन देनेसे होती है वह “उपहारसंधि” कहलाती है ॥ १०९ ॥ संतानसंधिर्विज्ञेयो दारिकादानपूर्वकः । सद्भिस्तु संगतः संधिर्मैत्रीपूर्व उदाहृतः ॥ ११० ॥ कन्यादान देनेसे जो हो उसे “सन्तानसंधि” जाननी चाहिये और सज्जनोंके साथ मित्रतापूर्वक मेल करनेको “संगतसंधि” कहते हैं ॥ ११० ॥ यावदायुःप्रमाणस्तु समानार्थप्रयोजनः । संपत्तौ वा विपत्तौ वा कारणैर्यो न भिद्यते ॥ १११ ॥ जितना अवस्थाका प्रमाण है, तब तक समान धनसे युक्त रहे और संपत्ति या विपत्तिमें अनेक कारणोंसेभी नहीं टूटे ॥ १११ ॥ हि० १७

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२५८ हितोपदेशः [संधिः ११२- संगतः संधिरेवायं प्रकृष्टत्वात् सुवर्णवत् । तथाऽन्यैः संधिकुशलैः काञ्चनः स उदाहृतः ॥ ११२ ॥ वह संगतसंधि परमोत्तम होनेसे सुवर्णके समान है और दूसरे संधि जानने वालोंने इसको “कांचनसंधि” कही है, अर्थात् सुवर्णके समान, नम भलेही जाय परन्तु टूटती नहीं है ॥ ११२ ॥ आत्मकार्यस्य सिद्धिं तु समुद्दिश्य क्रियेत यः । स उपन्यासकुशलैरुपन्यास उदाहृतः ॥ ११३ ॥ अपना काम निकालनेके अभिप्रायसे जो की जाती है, उसे नीति जानने वाले “उपन्याससंधि” कहते हैं ॥ ११३ ॥ मयाऽस्योपकृतं पूर्वं ममाप्येष करिष्यति । इति यः क्रियते संधिः प्रतीकारः स उच्यते ॥ ११४ ॥ मैंने पहले इसका उपकार किया है, यहभी भविष्यमें मेरे ऊपर उपकार करेगा; इस हेतुसे जो संधि की जाती है उसे “प्रतीकारसंधि” कहते हैं ॥ ११४ ॥ उपकारं करोम्यस्य ममाप्येष करिष्यति । अयं चाऽपि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव ॥ ११५ ॥ और मैं इसका उपकार करता हूं यहभी मेरा करेगा यहभी दूसरे प्रकारकी राम-सुग्रीव जैसी “प्रतीकारसंधि” है ॥ ११५ ॥ एकार्थं सम्यगुद्दिश्य क्रियां यत्र हि गच्छति । सुसंहितप्रमाणस्तु स च संयोग उच्यते ॥ ११६ ॥ जहां एकही प्रयोजनके करनेके लिये दृढ प्रमाणोंसे युक्त संधि होती है, उसको “संयोगसंधि” कहते हैं ॥ ११६ ॥ आवयोर्योधमुख्यैस्तु मदर्थः साध्यतामिति । यस्मिन्पणस्तु क्रियते स संधिः पुरुषान्तरः ॥ ११७ ॥ हम दोनोंके मुख्य योद्धा लोग हमारा कार्यसाधन करे; ऐसी जिसमें प्रतिज्ञा की जाती है वह “पुरुषांतरसंधि” है ॥ ११७ ॥ त्वयैकेन मदीयोऽर्थः संप्रसाध्यस्त्वसाविति । यत्र शत्रुः पणं कुर्यात् सोऽदृष्टपुरुषः स्मृतः ॥ ११८ ॥ और केवल तुझेही मेरे कामको अच्छी तरह कर देना चाहिये; ऐसी प्रतिज्ञा जिस संधिमें शत्रु करे उसे “अदृष्टपुरुषसंधि” कहते हैं ॥ ११८ ॥

जहाँ राज्यका एक भाग देनेके पणसे बलवान् शत्रुके साथ जो संधि की

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-१२५] सन्धि प्रकार २५९ यत्र भूम्येकदेशेन पणेन रिपुरूर्जितः । संधीयते संधिविद्भिः स चादिष्ट उदाहृतः ॥ ११९ ॥ जहाँ राज्यका एक भाग देनेके पणसे बलवान् शत्रुके साथ जो संधि की जाती है, उसको संधि जानने वाले "आदिष्टसंधि" कहते हैं ॥ ११९ ॥ स्वसैन्येन तु संधानमात्मादिष्ट उदाहृतः । क्रियते प्राणरक्षार्थं सर्वदानादुपग्रहः ॥ १२० ॥ अपनी सेनाके साथ जो संधि करता है वह "आत्मादिष्टसंधि" है और जो अपनी रक्षाके लिये सर्वस्व दे कर की जाती है वह "उपग्रहसंधि" है ॥ १२०॥ कोशांशेनार्धकोशेन सर्वकोशेन वा पुनः । शिष्टस्य प्रतिरक्षार्थं परिक्रय उदाहृतः ॥ १२१ ॥ जो कोशसे कुछ भाग, आधे कोशसे या संपूर्ण कोशसे सज्जन मंत्रीकी रक्षाके लिये की जाती है वह "परिक्रयसंधि" कही गई है ॥ १२१ ॥ भुवां सारवतीनां तु दानादुच्छिन्न उच्यते । भूम्युत्थफलदानेन सर्वेण परभूषणः ॥ १२२ ॥ सारवती अर्थात अन्नसे पूर्णा भूमिके देनेसे जो हो उसे "उच्छिन्नसंधि" कहते हैं और भूमिमें उपजे हुए संपूर्ण फलके देनेसे जो हो उसे "परभूषणसंधि" कहते हैं ॥ १२२ ॥ परिक्लिन्नं फलं यत्र प्रतिस्कन्धेन दीयते । स्कन्धोपनेयं तं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १२३ ॥ और जिसमें खेतसे लाया हुआ और स्वच्छ किया हुआ अन्न कंधोंके ऊपर लिब ले जा कर दिया जाता है, संधि जानने वाले उसको "स्कन्धोपनेयसंधि" कहते हैं ॥ १२३ ॥ परस्परोपकारस्तु मैत्री संबन्धकस्तथा । उपहारश्च विज्ञेयाश्चत्वारश्चैव संधयः ॥ १२४ ॥ परस्पर आपसमें उपकार, मित्रता, संबन्ध तथा भेट येभी चार प्रकारकी संधि जाननी चाहिये ॥ १२४ ॥ एक एवोपहारस्तु संधिरेव मतो मम । उपहारविभेदास्तु सर्वे मैत्र्यविवर्जिताः ॥ १२५ ॥

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केवल उपहार अर्थात् भेटही एक उपहार संधि है, यही मुझे संमत है, और उपहारसे भिन्न अन्य सब प्रकारकी संधियां मित्रतासे रहित है ॥ १२५ ॥ अभियोक्ता बलियस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते । उपहाराहृते तस्मात् संधिरन्यो न विद्यते' ॥ १२६ ॥ और चढ़ाई करके युद्धके लिये आने वाला शत्रु बलवान् होनेसे थोड़ाभी धन बिना लिये नहीं लौटता है इसलिये उपहारको छोड़ दूसरे प्रकारकी संधि नहीं है' ॥ १२६ ॥ राजाह—'भवन्तो महान्तः पण्डिताश्च । तदत्रास्माकं यथा- कार्यमुपदिश्यताम् ।' मन्त्री ब्रूते—'आः ! किमेवमुच्यते ? । राजा बोला—'आप लोग तो बड़े पण्डित हैं । इसलिये हमको जो करना चाहिये सो आज्ञा कीजिये ।' मंत्री बोला—'अजी ! आप क्या कहते हैं ? । आधिव्याधिपरीतापाद्य श्वो वा विनाशिने । को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ? ॥ १२७ ॥ मनका संताप, रोग और पुत्रादिक वियोगसे उत्पन्न हुआ क्लेश इनसे आज अथवा कल याने किसीभी क्षणमें विनाश पाने वाले शरीरके लिये कौनसा मनुष्य धर्मरहित आचरण करेगा ? ॥ १२७ ॥ जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवितं खलु देहिनाम् । तथाविधमिति ज्ञात्वा शश्वत् कल्याणमाचरेत् ॥१२८॥ देहधारियोंका जीवन निश्चय करके पानीमें दिखनेवाले चन्द्रमाका प्रतिबिंबके समान चंचल है ऐसा इसे जान कर सर्वदा कल्याणका आचरण करना चाहिये ॥ १२८ ॥ मृगतृष्णासमं वीक्ष्य संसारं क्षणभङ्गुरम् । सञ्जनैः संगतं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ॥ १२९ ॥ मृगतृष्णाके समान क्षणभंगुर संसारको विचार कर धर्म और सुखके लिये सज्जनोंके संग मेल करना चाहिये ॥ १२९ ॥ तन्मम संमतेन तदेव क्रियताम् । इसलिये मेरी समझसे वही करिये । यतः,— अश्वमेधसहस्राणि सत्यं च तुलया कृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेवातिरिच्यते ॥ १३० ॥

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-१३० ] राजपुत्रोंका राजनीतिको समझ जाना २६१ क्योंकि—सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सत्य, तराजूमें रख कर तोले गये तो सचमुच सहस्र अश्वमेधसे सत्यहीका पलड़ा भारी रहा ॥ १३० ॥ अतः सत्याभिधानदिव्यपुरःसरमप्यनयोर्भूकालयोः काञ्चनाभि- धानसंधिर्विधीयताम् ।' सर्वज्ञो ब्रूते—'एवमस्तु ।' ततो राज- हंसेन राज्ञा वस्त्रालंकारोपहारैः स मन्त्री दूरदर्शी पूजितः, प्रहृष्ट- मनाश्चक्रवाकं गृहीत्वा राज्ञो मयूरस्य संनिधानं गतः । तत्र चित्र- वर्णेन राज्ञा सर्वज्ञो गृध्रवचनाद्बहुमानदारपुरःसरं संभाषितस्त- थाविधं संधिं स्वीकृत्य राजहंससमीपं प्रस्थापितः । दूरदर्शी ब्रूते—'देव ! सिद्धं नः समीहितम् । इदानीं स्वस्थानमेव विन्ध्या- चलं व्यावृत्त्य प्रतिगम्यताम् । अथ सर्वे स्वस्थानं प्राप्य मनोभि- लषितं फलं प्राप्नुवन्त्विति । इसलिये सत्य वचनको स्वीकार करके इन दोनों राजाओंको कांचन नाम संधि करनी चाहिये.' सर्वज्ञ बोला—'यही ठीक है.' फिर राजहंसराजाने वस्त्र और अलंकारोंकी भेटसे उस मंत्री दूरदर्शीका सत्कार किया. और वह प्रसन्नचित्त हो कर चक्रवाकको ले कर राजा मयूरके पास गया. और वहां गिद्धके वचनसे चित्रवर्ण राजा बड़े आदरसत्कारपूर्वक सर्वज्ञसे बोल और उसी प्रकारकी अर्थात् कांचननाम संधिको स्वीकार करके राजहंससे बिदा हुआ। दूरदर्शी बोला—'महाराज ! हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ, अब अपने स्थान विंध्याचलकोही लोट कर चलना चाहिये. फिर सभीने अपने अपने स्थान पर पहुंच कर मनोवांछित फल पाया. विष्णुशर्मणोक्तम्—'अपरं किं कथयामि ? कथ्यताम् ।' राजपुत्रा ऊचुः—'तव प्रसादाद्राज्यव्यवहाराङ्गं ज्ञातम् । ततः सुखिनो भूता वयम् ।' विष्णुशर्माने कहा—'और क्या कहूं ? कहिये ।' राजपुत्र बोले—'आपके प्रसादसे राज्यके व्यवहारका अंग ( राजनीति ) जाना । और उसीसे हम सुखी हुये । विष्णुशर्मोवाच—'यद्यप्येवं तथाप्यपरमपीदमस्तु,— तब विष्णुशर्मा बोले—'यद्यपि ऐसा है तथापि यह और हो,—

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२६२ हितोपदेशः [ संधिः १३१- संधिः सर्वमहीभुजां विजयिनामस्तु प्रमोदः सदा सन्तः सन्तु निरापदः सुकृतिनां कीर्तिश्चिरं वर्धताम् । नीतिर्वारविलासिनीव सततं वक्षःस्थले संस्थिता वक्त्रं चुम्बतु मन्त्रिणामहरहर्भूयान्महानुत्सवः'॥ १३१॥ विजयशील राजाओंको संधि सदा प्रसन्न करने वाली हो, सज्जन मनुष्य विपत्तिरहित हों, सत्कर्म करने वालोंका यश बहुत काल तक बढ़े, नीति वेश्याके समान सर्वदा मन्त्रियोंके हृदय पर शोभायमान रह कर मुखचुम्बन करती रहे अर्थात् मुख और हृदयमें निवास करे और प्रतिदिन अधिक आनन्द हो ॥१३१॥ अन्यच्चास्तु,— यह और भी हो कि,— प्रालेयाद्रेः सुतायाः प्रणयनिवसतिश्चन्द्रमौलिः स याव- द्यावलक्ष्मीर्मुरारेर्जलद इव तडिन्मानसे विस्फुरन्ती। यावत् स्वर्णाचलोऽयं दवदहनसमो यस्य सूर्यः स्फुलिङ्ग- स्तावन्नारायणेन प्रचरतु रचितः संग्रहोऽयं कथानाम् ॥१३२॥ जब तक चन्द्रशेखर महादेवजी हिमाचलकी कन्या पार्वतीजीके साथ स्नेहपूर्वक बसें, जब तक मेघमें बिजलीके समान श्रीविष्णु भगवान्के हृदयमें लक्ष्मी निवास करे, और जब तक जिसके चिनगारीके समान सूर्य है ऐसा दावानलके समान मेरु पर्वत स्थित रहे तब तक नारायणपण्डितका बनाया हुआ यह कथाओंका संग्रह प्रचलित रहे ॥ १३२ ॥ अपरं च,— श्रीमान् धवलचन्द्रोऽसौ जीयात् माण्डलिको रिपून् । येनायं संग्रहो यत्नाल्लेखयित्वा प्रचारितः ॥ १३३ ॥ और यह चक्रवर्ती श्रीमान् राजा धवलचन्द्र शत्रुओंको पराजित करें, कि जिन्होंने यह संग्रह यत्न पूर्वक लिखवा कर प्रचार किया ॥ १३३ ॥ इति ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेशग्रंथके संधिप्रकरण चतुर्थ भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्. समाप्तोऽयं हितोपदेशः।

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परिशिष्ट पहला परीक्षाप्रश्नपत्रसंग्रहः Bengal Sanskrit Association प्रथमपरीक्षा १९४७ १. अधस्तनेषु सन्दर्भेषु द्वयोरनुवादो मातृभाषया कार्यः— (१) अनन्तरं स सिंहो यदा कदाचिदपि मूषिकशब्दं न शुश्राव तदोपयोगाभावात् तस्य बिडालस्याहारदाने मन्दादरो बभूव । ततोऽसावा- हारविरहाद्दुर्बलो दधिकर्णोऽवसन्नो बभूव । (२) तत्र करपत्रविदार्यमाणकाष्ठस्तम्भस्य कियद्दूरविदीर्णखण्डद्वयस्य मध्ये कीलकः सूत्रधारेण निहितः । तत्र च वनवासी महान् वानरयूथः क्रीडनार्थमागतः । तेष्वेको वानरः कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः । (३) एतच्चिन्तयित्वा सञ्जीवक आह—भो मित्र ! कथमसौ मां जिघां- सुरिति ज्ञातव्यः ? । दमनको ब्रूते—यदासौ स्तब्धकर्णः समुद्धतलाङ्गूलः समुन्नतचरणो विकृतास्यस्त्वां पश्यति, तदा त्वमपि स्वविक्रमं दर्शयिष्यसि । २. (क) स्थान एव नियोज्यन्ते भृत्याश्चाभरणानि च । न हि चूडामणिः पादे नूपुरं शिरसा कृतम् ॥ १ ॥ यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवतु । काकोऽपि किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ॥ २ ॥ नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि । कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ ३ ॥ न परस्यापवादेन परेषां दण्डमाचरेत् । आत्मनावगमं कृत्वा बध्नीयात् पूजयेत वा ॥ ४ ॥ समुल्लिखितश्लोकेषु द्वयोः सरलदेवभाषया व्याख्या क्रियताम् । (ख) प्रथमप्रश्ने रेखाङ्कितपदेषु त्रयाणां ससूत्रं सन्धिविश्लेषः कार्यः । (ग) “चञ्च्वा” इति पदस्य चतुर्थ्येकवचने “परेषाम्” इति पदस्य प्रथमाबहुवचने परिवर्तनं कार्यम् । अथवा “आत्मना” इति पदस्य सप्तम्येकवचने “शिरसा” इति पदस्य च प्रथमाबहुवचने परिवर्तनं कार्यम् ।

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२ (घ) द्वितीयप्रश्ने “यस्मिन्” इत्यत्र “स्थान एव” इत्यत्र च कथं का विभक्तिः ? (ङ) अधोलिखितपदेषु त्रीणि सूत्राण्युल्लिख्य साध्यन्ताम्— निहितः; शुश्राव; कुरुते; असौ; म्रियते । प्रथमपरीक्षा १९४८ १. अधोलिखितेषु सन्दर्भेषु त्रयाणामनुवादो मातृभाषया कार्यः— (१) ततो दिनेषु गच्छत्सु स पक्षिशावकान् आक्रम्य स्वकोटरमानीय प्रत्यहं खादति । अथ येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकार्तैर्विलपद्भिः इत- स्ततो जिज्ञासा समारब्धा । तत् परिज्ञाय मार्जारः कोटरान्निःसृत्य बहिः पलायितः । (२) अथ प्रभाते स क्षेत्रपतिर्लगुडहस्तस्तत्प्रदेशं गच्छन् काकेनावलोकि- तः । तमालोक्य काकेनोक्तम्—“सखे मृग ! तमात्मानं मृतवत् सन्दर्श्य वातेनोदरं पूरयित्वा पादान् स्तब्धीकृत्य तिष्ठ, अहं तव चक्षुषी चञ्च्वा किमपि विलिखामि । यदाहं शब्दं करिष्यामि तदा त्वमुत्थाय सत्वरं पलायिष्यसे ।” (३) अथ कदाचिदवसन्नायां रात्रावस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमु- दिनीनायके चन्द्रमसि, लघुपतनकनामा वायसः प्रबुद्धः कृतान्तमिव द्वितीय- मटन्तं व्याधमपश्यत् । तमवलोक्याचिन्तयत्—“अद्य प्रातरेवानिष्टदर्शनं जातं, न जाने किमनभिमतं दर्शयिष्यति” इत्युक्त्वा तदनुसरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः । (४) ततो हिरण्यकश्च सर्वदापायशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतावपातभयाच्चकितस्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच—“सखे हिरण्यक ! कथमस्मान् न सम्भाषसे ?” । ततो हिरण्यकस्तद् वचनं प्रत्यभिज्ञाय ससम्भ्रमं बहिर्निःसृत्याब्रवीत्—आः ! पुण्यवानस्मि, प्रियसुहृन्मे चित्रग्रीवः समायातः । २. शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ १ ॥ शरीरस्य गुणानाञ्च दूरमत्यन्तमन्तरम् । शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः ॥ २ ॥

(क) उल्लिखितश्लोकेषु त्रयाणां सरलसुरगिरा व्याख्या क्रियताम् ।

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३ विगुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनि ॥ ३ ॥ आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः । तज्जयः संपदां मार्गो येनेष्टं तेन गम्यताम् ॥ ४ ॥ सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते स्वभावा नेतरे गुणाः । अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते ॥ ५ ॥ (क) उल्लिखितश्लोकेषु त्रयाणां सरलसुरगिरा व्याख्या क्रियताम् । (ख) प्रथमप्रश्ने रेखाङ्कितपदेषु पञ्चानां ससूत्रं सन्धिविश्लेषः कार्यः । (ग) “वेश्मनि” इति पदस्य प्रथमैकवचने, “पन्थाः” इति पदस्य च चतुर्थ्येकवचने परिवर्तनं क्रियताम् अथवा “चक्षुषी” इति पदस्य षष्ठीबहुवचने, “चन्द्रमसि” इति पदस्य च प्रथ- मैकवचने परिवर्तनं क्रियताम् । (घ) प्रथमप्रश्ने “गच्छत्सु” इत्यत्र, “अनुसरणक्रमेण” इत्यत्र च कथं का विभक्तिः ? (ङ) अधोलिखितेषु त्रीणि सूत्राण्युल्लिख्य साध्यन्ताम्— सन्दर्श्य; उत्थाय; जाने; उक्त्वा; प्रबुद्धः । ३. किं तावत् पण्डितलक्षणम् ? के तावद् दुःखभागिनः ? अथवा कस्तावद् बान्धवः ? के वा स्वर्गगामिनः ? मित्रलाभादुद्धृत्य श्लोकद्वयं लिख्यतां धीमद्भिः । प्रथमपरीक्षा १९४९ १. अधोलिखितेषु सन्दर्भेषु त्रयाणामनुवादो मातृभाषया कार्यः— (क) सखे ! सविशेषं पूजामस्मै विधेहि; यतोऽयं पुण्यकर्मणां धुरीणः कारुण्यरत्नाकरो मूषिकराजः । एतस्य गुणस्तुतिं जिह्वासहस्रेण यदि सर्पराजः कदाचित् कर्तुं समर्थः स्यात् । (ख) अनेकगोमानुषाणां वधान्मे पुत्रा मृता दाराश्च । ततः केनचिद् धार्मिकेणाहमुपदिष्टः—दानधर्मादिकं चरतु भवानिति । तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो न कथं विश्वासभूमिः ?

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४ (ग) इत्याकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन्नब्रवीत्—'साधु मित्र ! साधु, अनेनाश्रितवात्सल्येन त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि युज्यते' । एवमुक्त्वा तेन सर्वेषां बन्धनानि छिन्नानि । (घ) युष्मान् धर्मज्ञानरतान् विश्वासभूमय इति पक्षिणः सर्वे सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति । अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो धर्मं श्रोतुमिहागतः । भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथिं हन्तुमुद्यताः । (ङ) चित्राङ्गो जलसमीपं गत्वा मृतमिवात्मानं निश्चेष्टं दर्शयतु । काकश्च तस्योपरि स्थित्वा चञ्च्वा किमपि विलिखतु । नूनमनेन लुब्धकेन कच्छपं परित्यज्य मृगमांसार्थिना सत्वरं तत्र गन्तव्यम् । २. (क) (घ) चिह्नितप्रश्ने "विश्वासभूमयः" इत्यत्र "भवद्भ्यः" इत्यत्र च कथं का विभक्तिः ? (ख) प्रथमप्रश्ने रेखाङ्कितपदयोः व्यासवाक्योल्लेखपूर्वकं समासनाम- निर्देशः क्रियताम् । (ग) अधोलिखितेषु द्वयोः सूत्राण्युल्लिख्य सन्धिविश्लेषः कार्यः— वन्धान्मे; सन्नब्रवीत् ; इत्याकर्ण्य । (घ) चञ्चु-शब्दस्य षष्ठ्येकवचने भूमि-शब्दस्य च सप्तम्येकवचने रूपाणि लिख्यन्ताम् । ३. अधोलिखितश्लोकेषु त्रयाणां सरलसुरगिरा व्याख्या क्रियताम्— (१) अचिन्तितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् । सुखान्यपि तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते ॥ (२) सर्वाः सम्पत्तयस्तस्य सन्तुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य सर्वा चर्मावृतेव भूः ॥ (३) अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका । तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (४) प्राणा यथाऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ ४. अधोलिखितश्लोकस्य मातृभाषया सरलार्थो लिख्यताम्— शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् । सुचिन्तितौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥ —००००—

हितोपदेशकी श्लोकसूची ।

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परिशिष्ट दूसरा हितोपदेशकी श्लोकसूची । पृ० श्लो० पृ० श्लो० अ. अदेशस्थो हि रिपुणा २३३ ४४ अकस्माद्युवती वृद्धं ४९ १०९ अधीतव्यवहारार्थं १६५ १११ अकाण्डपातजातानां २४६ ८२ अधोऽधः पश्यतः कस्य ८५ २ अकालसहमत्यल्पं २०९ १३७ अनभ्यासे विषं विद्या ५ २३ अकालसैन्ययुक्तस्तु २३४ ४६ अनागतवतीं चिन्तां २२५ १५ अङ्गाङ्गिभावमज्ञात्वा १४१ १४९ अनागतविधाता च २१६ ५ अचिन्तितानि दुःखानि ६४ १६६ अनाहूतो विशेद्यस्तु १०१ ५२ अजरामरवत्प्राज्ञो १ ३ अनित्यं यौवनं रूपं २४४ ६७ अज्ञः सुखमाराध्यः २५४ ९९ अनिष्टादिष्टलाभेऽपि १५ ६ अज्ञातकुलशीलस्य ३१ ५६ अनुचितकार्यारम्भः १४२ १५१ अजातमृतमूर्खाणां ३ १३ अनेकचित्रमन्त्रस्तु २३३ ४० अज्ञानं कारणं न स्यात् २४६ ८१ अनेकयुद्धविजयी २३१ २८ अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा ८७ १२ अनेकसंशयोच्छेदि ३ १० अत एव हि नेच्छन्ति २४५ ७७ अन्तर्दुष्टः क्षमायुक्तः ११९ १०१ अतथ्यान्यपि तथ्यानि १२७ ११३ अन्यथैव हि सौहार्दं ४५ १०० अतिथिर्यस्य भग्नाशो ३४ ६२ अन्यदा भूषणं पुंसां १५९ ७ अतिव्ययोऽनवेक्षा च ११८ ९४ अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वं १९१ ९७ अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि अपराधः न दैवस्य २१५ २ पार्थिवे च १३५ १२७ अपराधेऽपि निःशङ्को ११९ ९८ अत्यन्तविमुखे दैवे ५५ १३२ अपराधो न मेऽस्तीति ३९ ७५ अदुर्गो विषयः कस्य १७८ ५१ अपायसंदर्शनां विपत्तिं १०३ ६२ अदृष्टनर आदिष्टः २५७ १०७ अपुत्रस्य गृहं शून्यं ५४ १२७ अदेशस्थो बहुरिपुः २३१ ३२ अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयात् १३८ १४०

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२ हितोपदेशकी पृ० श्लो० | पृ० श्लो० अप्रसादोऽनधिष्ठानं १८९ ९० | अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा १०७ ७५ अप्राप्तकालवचनं १०४ ६३ | अश्वमेधसहस्त्राणि २६० १३० अप्रियस्यापि पथ्यस्य १३७ १३५ | असंतुष्टा द्विजा नष्टाः १८४ ६४ अप्रियाण्यपि कुर्वाणो १३६ १३३ | असंभवं हेममृगस्य २१ २८ अबुधैरर्थलाभाय ९१ २४ | असंभोगेन सामान्यं ६२ १६२ अभियोक्ता बलीय २६० १२६ | असत्यं साहसं माया ७४ १९९ अभेदेन च युध्येत १८७ ७९ | असाधना वित्तहीना १२ २ अभ्रच्छाया खलप्रीतिः ६८ १८१ | असेवके चानुरक्तिः १०३ ६० अम्भांसि जलजन्तूनां ७३ १९६ | असेवितेश्वरद्वारं ५९ १४७ अयं निजः परो वेति ३६ ७० | अस्माभिर्निर्मिता १५८ ६ अयुद्धे हि यदा १४९ १७१ | अस्मिंस्तु निर्गुणं गोत्रे १० ४४ अरक्षितं तिष्ठति ८९ १८ | अहितहितविचार- अरावप्युचितं कार्यं ३३ ५९ | शून्यबुद्धेः ९९ ४५ अर्थनाशं मनस्तापं ५५ १३० | आ. अर्थाः पादरजोपमाः ६१ १५५ | आकारैरिङ्गितैर्गत्या १०० ५० अर्थागमो नित्यमरोगिता ५ २० | आज्ञाभङ्गकरान् राजा १२१ १०७ अर्थेन तु विहीनस्य ५४ १२५ | आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां ११३ ८५ अलब्धं चैव लिप्सेत ६ ८ | आत्मकार्यस्य सिद्धिं तु २५८ ११३ अल्पानामपि वस्तूनां २३ ३५ | आत्मनश्च परेषां च १५९ ८ अल्पेच्छुधृतिमान्प्राज्ञः १०२ ५६ | आत्मपक्षं परित्यज्य १८० ५७ अवज्ञानाद्राज्ञो १०८ ७७ | आत्मा नदी संयम- अवशेन्द्रियचित्तानां १८ १८ | पुण्यतीर्था २४८ ८६ अवश्यंभाविनो भावा ७ २८ | आत्मोदयः परग्लानिः १९० ९६ अवस्कन्दभयात् २०० १११ | आत्मौपम्येन यो वेत्ति २३६ ५२ अविचारयतो युक्ति २२२ ११ | आदानस्य प्रदानस्य २५२ ९४ अविद्वानपि भूपालो २०१ ११४ | आदित्यचन्द्रावनिलो- अव्यवसायिनमलं ८५ ४ | ऽनलश्च १२६ ११२ अव्यापारेषु व्यापारं ९२ ३० | आदेयस्य प्रदेयस्य १४० १४६

श्लोकसूची ३

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श्लोकसूची ३ पृ० श्लो० | पृ० श्लो० आधिव्याधिपरीतापात् २६० १२७ | उ. आपत्सु मित्रं जानीयात् ३८ ७२ | उत्तमस्यापि वर्णस्य ३४ ६३ आपदर्थे धनं रक्षेत् २६ ४२ | उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं १३ ४ आपदामापतन्तीनां २२ ३० | उत्पन्नामापदं यस्तु २१७ ६ आपद्युन्मार्गगमने १०४ ६४ | उत्पन्नेष्वपि कार्येषु १२८ ११४ आपद्युन्मार्गगमने कार्य १३४ १२४ | उत्सवे व्यसने चैव ३८ ७३ आपातरमणीयानां २४५ ७४ | उत्सवे व्यसने युद्धे २४३ ६१ आपीडयन् बलं शत्रोः १८९ ९१ | उत्साहशक्तिहीनत्वात् २३२ ३५ आमरणान्ताः प्रणयाः ७० १९२ | उत्साहसंपन्नमदीर्घसूत्रं ६७ १७८ आयुः कर्म च वित्तं च ६ २७ | उदीरितोऽर्थः पशुनापि आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं ५५ १३१ | गृह्यते १०० ४९ आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः २०४ १२२ | उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु १६३ १५ आराध्यमानो नृपतिः १४५ १५८ | उद्यमेन हि सिध्यन्ति ८ ३६ आरोप्यते शिला शैले ९९ ४७ | उद्योगिनं पुरुषसिंह- आलस्यं स्त्रीसेवा सरोगता ८५ ५ | मुपैति ७ ३१ आवयोर्योधमुख्यैस्तु २५८ ११७ | उपकर्ताऽधिकारस्थः ११९ ९९ आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां ११३ ८५ | उपकर्त्राऽरिणा संधिर्न २२४ १४ आश्रितानां भृतौ स्वामि ९५ ३३ | उपकारं करोम्यस्य २५८ ११५ आसन्नतरतामेति २४४ ६६ | उपकारिणि विश्रब्धे ४० ७९ आसन्नमेव नृपतिर्भजते १०२ ५८ | उपजापश्शिरारोधो २०९ १३८ आसीद्वीरवरो नाम १९२ ९९ | उपायं चिन्तयन् प्राज्ञो २१९ ८ आहवेषु च ये शूराः २१३ १४७ | उपायेन हि यच्छक्यं १३० १२० आहारनिद्राभयमैथुनं च ६ २५ | उपायेन हि यच्छक्यं ७५ २०२ आहारो द्विगुणः स्त्रीणां १३० ११९ | उपार्जितानां वित्तानां ६१ १५६ इ. | उपांशु क्रीडितोऽमात्यः ११९ १०० इज्याध्ययनदानानि १६ ८ | उशना वेद यच्छास्त्रं ५३ १२२ ई. | ऋ. ईर्ष्यी घृणी त्वसंतुष्टः २० २५ | ऋणकर्ता पिता शत्रुः ५ २२

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४ हितोपदेशकी पृ० श्लो० | पृ० श्लो० ए. | कल्पयति येन वृत्तिं १०४ ६५ एकं भूमिपतिः करोति | कश्चिदाश्रयसौन्दर्यात् १४५ १५७ सचिवं १३५ १२८ | काकतालीयवत्प्राप्तं ८ ३५ एकः शतं योधयति १७८ ५० | काचः काञ्चनसंसर्गात् ९ ४१ एक एव सुहृद्धर्मो ३५ ६५ | कामः क्रोधस्तथा मोहो २५३ ९५ एक एवोपहारस्तु २५९ १२५ | कामः सर्वात्मना हेयः २४९ ९० एकत्र राजविश्वासो १४४ १५५ | कायः संनिहिता पायः ८० २१२ एकद्वा न विगृह्णीयात् २५१ ९२ | कायः संनिहिता पायः २४३ ६४ एकस्य दुःखस्य न | कालयापनमाशानां १०३ ६१ यावदन्तं ७९ २०८ | काव्यशास्त्रविनोदेन १२ १ एकार्थां सम्यगुद्दिश्य २५८ ११६ | किं चान्यैर्न कुलाचारैः ११८ ९३ एतावजन्मसाफल्यं ९० २२ | किं भक्तेनासमर्थेन १०७ ७६ एतैः सन्धि न कुर्वीत २३२ ३३ | किं मन्त्रेणाननुष्ठानात् १८६ ६८ एहि गच्छ पतत्तिष्ठ ९१ २४ | किमप्यस्ति स्वभावेन १०१ ५३ औ. | कीटोऽपि सुमनःसङ्गात् १० ४५ औरसं कृतसंबन्धं ७२ १९५ | कुतः सेवाविहीनानां ९२ २९ क. | कुर्वन्नपि व्यलीकानि १३६ १३२ कङ्कणस्य तु लोभेन १४ ५ | कुसुमस्तबकस्येव ५६ १३४ कथं नाम न सेव्यन्ते ९२ २८ | कृतकृत्यस्य भृत्यस्य २२१ १० कदर्धितस्यापि च धैर्य- | कृतशतमसत्सु नष्टं १४६ १६१ वृत्तेः १०६ ६७ | कोऽतिभारः समर्थानां ८७ १३ कनकभूषणसंग्रहणोचितो १०७ ७२ | कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात् १०१ ५५ कपाल उपहारश्च २५७ १०६ | को धन्यो बहुभिः पुत्रैः ५ २१ कपालसंधिर्विज्ञेयः २५७ १०९ | को धर्मो भूतदया ५९ १४९ कमण्डलूपमोऽमात्यः ११७ ९१ | कोऽर्थः पुत्रेण जातेन ३ १२ करोतु नाम नीतिज्ञो ८८ १४ | कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो १४३ १५३ कर्तव्यः संचयो नित्यं ६३ १६४ | को वीरस्य मनस्विनः कर्मानुमेयाः सर्वत्र २५४ १०० | स्वविषयः ६६ १७५

श्लोकसूची ५

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श्लोकसूची ५ पृ० श्लो० पृ० श्लो० कोशांशेनार्धकोशेन २५९ १२१ चितौ परिष्वज्य विचेतनं कौर्मं संकोचमास्थाय १७७ ४८ पतिं १७१ ३० क्रतौ विवाहे व्यसने २०५ १२४ छ. क्रूरं मित्रं रणे चाऽपि १९० ९४ छिद्रं मर्म च वीर्यं च १८२ ५९ क्रोडीकरोति प्रथमं २४३ ६२ ज. क्व गताः पृथिवीपालाः २४३ ६३ जनं जनपदा नित्यं १०८ ७८ क्षमा शत्रौ च मित्रे १५२ १८० जनयन्ति सुतान् गावः २१२ १४६ क्षिप्रमायमनालोच्य ११८ ९५ जनयन्त्यर्जने दुःखं ६८ १८४ क्षुद्रशत्रुर्भवेद्यस्तु ११२ ८४ जन्मनि क्लेशबहुले ६९ १८८ ख. जन्ममृत्युजराव्याधि २४८ ८७ खलः करोति दुर्वृत्तं १६६ २१ जमदग्नेः सुतस्येव २३० २७ ख्यातः सर्वरसानां हि १७९ ५६ जये च लभते १५० १७२ ग. जलबिन्दुनिपातेन ८७ १० गतानुगतिको लोकः १६ १० जलमग्निरिविषं शस्त्रं ६३ १६५ गुणदोषान्निश्चित्य १३९ १४४ जलान्तश्चन्द्रचपलं २६० १२८ गुणा गुणज्ञेषु गुणा जातिद्रव्यगुणानां च २७ ४५ भवन्ति ११ ४७ जातिमात्रेण किं कश्चित् ३३ ५८ गुणाश्रयं कीर्तियुतं च जीवन्ति च म्रियन्ते च १९६ १०१ कान्तं १२९ ११७ जीविते यस्य जीवन्ति ९६ ३६ गुणिगणगणनारम्भे ४ १६ त. गुरुर्भिर्द्विजातीनां ४८ १०८ तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो १६ ९ घ. तत्र मित्र ! न वस्तव्यं ४७ १०६ घर्मातं न तथा सुशी- तस्करेभ्यो नियुक्तेभ्यः १२१ १०९ तलजलैः ४५ ९७ तानीन्द्रियाण्यविक- घृतकुम्भसमा नारी ५२ ११८ लानि ५५ १२९ च. तावद् भयस्य भेतव्यं ३२ ५७ चन्दनतरुषु भुजङ्गा १४७ १६२ तिरश्चामपि विश्वासो ४२ ८५ चलत्येकेन पादेन ४६ १०२ तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी १७१ २८

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६ हितोपदेशकी पृ० श्लो० पृ० श्लो० तीथोश्रमशुरस्थाने १७४ ३५ दीपनिर्वाणगन्धं च ३९ ७६ तृणानि नोन्मूलयति ११४ ८८ दीर्घवर्त्मपरिश्रान्तं २०० १०८ तृणानि भूमिरुदकं ३४ ६० दुःखमेवास्ति न सुखं २४८ ८८ तृष्णां चेह परित्यज्य ७० १९० दुःखितोऽपि चरेद्धर्मं २४७ ८४ तेनाधीतं श्रुतं तेन ५९ १४६ दुर्गं कुर्यान्महाखातं १७८ ५२ त्यजेत् क्षुधातां महिला २३९ ५४ दुर्जनः परिहर्तव्यो ४३ ८९ त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ६० १५१ दुर्जनः प्रियवादी च ४० ८२ त्रासहेतोर्विनीतिस्तु १३२ १२३ दुर्जनगम्या नार्यः १४५ १५६ त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैः ४१ ८३ दुर्जनदूषितमनसः २५५ १०२ त्रिविधाः पुरुषा राजन् ! १०६ ७० दुर्जनेन समं सख्यं ४० ८० त्वयैकेन मदीयोऽर्थः २५८ ११८ दुर्जनैरुच्यमानानि १६८ २३ दुर्जनो नार्जवं याति १३८ १३७ द. दुर्भिक्षव्यसनी चैव २३३ ४३ दक्षः श्रियमधिगच्छति २०१ ११३ दुर्मन्त्रिणं किमुपयन्ति २०२ ११७ दन्तस्य निर्घर्षणकेन दुर्वृत्तः क्रियते १५१ १७५ राजन् ! १०५ ६६ दुष्टा भार्या शठं मित्रं १३१ १२१ दरिद्रान्भर कौन्तेय ! १७ १५ दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्यः १८३ ६२ दातव्यमिति यद्दानं १७ १६ दूरादवेक्षणं हासः १०३ ५९ दाता क्षमी गुणग्राही २१० १४० दूरादुच्छ्रितपाणिराद्र्र- दानं प्रियवाक्सहितं ६३ १६३ नयनः १४७ १६४ दानं भोगो नाशस्तिस्रो ६२ १६१ दूषयेच्चास्य सततं १८८ ८२ दाने तपसि शौर्ये च ४ १५ देवतासु गुरौ गोषु २०३ १२० दानोपभोगरहिता दैवोपहतकश्चैव २३१ ३१ दिवसा ८७ ११ दोषभीतेरनारम्भः १०२ ५७ दानोपभोगहीनेन ६२ १५९ द्रवत्वात्सर्वलोहानां ४४ ९३ दायादादपरो मन्त्रो १९० ९२ ध. दारिद्याद्वियमेति ५६ १३६ धनं तावदसुलभं ६९ १८९ दारिद्यान्मरणाद्वापि ५४ १२८ धनलुब्धो ह्यसन्तुष्टो ५८ १४३

श्लोकसूची ७

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श्लोकसूची ७ पृ० श्लो० | पृ० श्लो० धनवान्बलवाँल्लोके ५३ १०३ | न धर्मशास्त्रं पठतीति १८ १७ धनवानिति हि मदो मे ६८ १८० | न नरस्य नरो दासो १८७ ७८ धनानि जीवितं चैव २६ ४४ | नन्दं जघान चाणक्यः १८२ ६० धनानि जीवितं चैत्र १९५ १०० | न परस्यापराधेन १३९ १४३ धनाशा जीविताशा च ५० ११२ | न भूपदानं न सुवर्ण- धनेन किं यो न ददाति ८६ ९ | दानं २४० ५६ धनेन बलवाँल्लोके ५४ १२४ | न मातरि न दारेषु ८० २१० धर्मार्थं यस्य वित्तेहा ६९ १८५ | न योजनशतं दूरं ५९ १४८ धर्मार्थकामतत्त्वज्ञो १५२ १७९ | न राज्यं प्राप्तमित्येव २०१ ११२ धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणा २६ ४३ | नरेशे जीवलोकोऽयं २१२ १४५ धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यै ६ २६ | न लज्जा न विनीतत्वं ५२ १२० धान्यानां संग्रहो | न शरन्मेघवत्कार्यं २५० ९१ राजन् ! १७९ ५५ | न संशयमनारुह्य १५ ७ धार्मिकस्याभियुक्तस्य २३० २३ | न सा भार्येति वक्तव्या ७४ २०९ धूर्तः स्त्री वा शिशु- | न सा सभा यत्र न र्यस्य २०७ १३१ | सन्ति वृद्धाः १८३ ६१ न. | न साहसैकान्तरसानु २०२ ११६ न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं ३७ ७१ | न सोऽस्ति पुरुषो १३६ १३१ न कस्यचित्कश्चिदिह ९९ ४६ | न स्त्रीणामप्रियः कश्चित् ५१ ११७ न गणस्याग्रतो गच्छेत् २१ २९ | न स्थातव्यं न गन्तव्यं १६७ २२ नगरस्थो वनस्थो १७० २६ | न स्वल्पमप्यध्यव- न तथोत्थाप्यते ग्रावा १७६ ४२ | सायभीरोः ६५ १७२ न तादृशीं प्रीतिमुपैति १२९ ११८ | नाकाले म्रियते जन्तुः ८८ १७ न दानेन न मानेन १२८ ११६ | नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां १२८ ११५ नदीनां शस्त्रपाणीनां १९ १९ | नाद्रव्ये निहिता काचित् १० ४३ न देवाय न विप्राय ६२ १६० | नानिवेश्य प्रकुर्वीत ११७ ५१ न दैवमपि संचिन्त्य ७ ३० | नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति ६५ १७० नद्यद्रिवनदुर्गेशु १८६ ६९ | नाभिषेको न संस्कारः ८९ १९ हि० १८

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८ हितोपदेशकी पृ० श्लो० पृ० श्लो० नायमत्यन्तसंवासो २४५ ७२ परस्परोपकारस्तु २५९ १२४ नारिकेलसमाकारा ४४ ९४ पराधिकारचर्चां यः ९३ ३१ नाशयेत् कर्षयेत् शत्रून् १८७ ७६ पराभवं परिच्छेत्तुं १४२ १५० निजसौख्यं निरुन्धानो ६२ १५८ परिच्छिन्नं फलं यत्र २५९ १२३ निपानमिव मण्डूकाः ६७ १७६ परिच्छेदो हि पाण्डित्यं ६० १५० निपीडिता वमन्युच्चैः १२० १०५ परुषाण्यपि या प्रोक्ता १७० २५ निमग्नस्य पयोराशौ ८८ १६ परैः संभुज्यते १५१ १७६ निमित्तमुद्दिश्य हि यः १४६ १५९ परोक्षे कार्यहन्तारं ३९ ७७ नियतविषयवर्ती प्रायशो ७७ २०६ परोपदेशे पाण्डित्यं ४७ १०३ नियुक्तः क्षत्रियो द्रव्ये ११९ ९७ परोऽपि हितवान् बन्धुः १९२ ९८ नियोग्यर्थग्रहापायो १२० १०४ पर्जन्य इव भूतानामा- निरपेक्षो न कर्तव्यो १११ ८३ धारः ७६ २०५ निरुत्साहं निरानन्दं ८६ ७ पल्लवग्राहि पाण्डित्यं ५८ १४० निर्गुणेष्वपि सत्वेषु ३४ ६१ पश्चात्सेनापतिर्यायात् १८६ ७२ निर्विशेषो यदा राजा १०६ ६९ पानं दुर्जनसंसर्गः ५१ ११५ नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य २२२ १२ पानं स्त्री मृगया २०१ ११५ नृपः कामासक्तो पानीयं वा निरायासं ६० १५२ गणयति १३९ १४२ पार्श्वयोरुभयोरक्षाः १८६ ७१ नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं ५० ११३ पिता रक्षति कौमारे ५२ १२१ प. पिता वा यदि वा १५२ ७७८ पङ्कपांशुजलाच्छन्नं २०० ११० पुण्यतीर्थे कृतं येन ५ १९ पञ्चभिर्निर्मिते देहे २४४ ७० पुण्याल्लब्धं यदेकेन १९८ १०५ पञ्चमिर्याति दासत्वं ९७ ३८ पुरस्कृत्य बलं राजा २०८ १३६ पटुत्वं सत्यवादित्वं ४५ ९९ पुरावृत्तकथोद्गारैः १९९ १०६ पतितेषु हि दृष्टेषु ५० १११ पूर्वजन्मकृतं कर्म ८ ३३ पदातींश्च महीपालः १८८ ८० पृष्ठतः सेवयेदर्कं ९५ ३४ पयःपानं भुजंगानां १५७ ४ पोतो दुस्तरवारिराशि- परस्परज्ञाः संहृष्टाः २०६ १२६ तरणे १४८ १६५

श्लोकसूची ९

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श्लोकसूची ९ पृ० श्लो० । पृ० श्लो० प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा २११ १४४ । बलेषु प्रमुखो हस्ती १८८ ८३ प्रजां संरक्षति नृपः १५६ ३ । बहुशत्रुस्तु संत्रस्तः २३३ ४५ प्रणमत्युन्नतिहेतोः ९२ २७ । बालस्याल्पप्रभावत्वाच्च २३२ १४ प्रणयादुपकाराद्वा २२१ ९ । बालादपि ग्रहीतव्यं १०८ ७९ प्रतिक्षणमयं कायः २४३ ६५ । बालोऽपि नावमन्तव्यो ११० ८३ प्रतिवाचमदत्त केशदः ११४ ८७ । बालो वा यदि वा वृद्धो ४८ १०७ प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे १६९ २४ । बालो वृद्धो दीर्घरोगी २३१ २९ प्रत्याख्याने च दाने च १७ १३ । बुद्धिमाननुरक्तोऽयं १०७ ७४ प्रत्यूहः सर्वसिद्धीनां १७६ ४५ । बुद्धिर्यस्य बलं तस्य १३१ १२२ प्रथमं युद्धकारित्वं १८९ ८६ । ब्रह्महापि नरः पूज्यो ८५ ३ प्रमत्तं भोजनव्यग्रं २०० १०९ । ब्राह्मणः क्षत्रियो बन्धुः ११९ ९६ प्रसादं कुरुते पत्युः १६६ २० । भ. प्रस्तावसदृशं वाक्यं १०१ ५१ । भक्षयित्वा बहून्मत्स्यान् २२३ १३ प्राक् पादयोः पतति ४० ८१ । भक्षितेनापि भवता ४२ ८४ प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा १६ १२ । भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिः ३० ५५ प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य १२० १०३ । भक्तो गुणी शुचिः १६६ १९ प्रालेयाद्रेः सुतायाः २६२ १३२ । भर्ता हि परमं १७० २७ प्रियं ब्रूयादकृपणः १९७ १०२ । भवेत् स्वपरराष्ट्राणां १७३ ३४ भवेऽस्मिन् पवनोद्भ्रान्त २११ १४२ ब. । भीरुर्युद्धपरित्यागात् २३२ ३७ बन्धुः को नाम १५० १७४ । भुवां सारवतीनां तु २५९ १२२ बन्धुस्त्रीभृत्यवर्गस्य १०९ ८० । भूमिर्मित्रं हिरण्यं च १८४ ६६ बलमश्वश्च सैन्यानां १८८ ८४ । भूम्येकदेशस्य १५२ १७७ बलवानपि निस्तेजाः १५० १७२ । भोगस्य भाजनं राजा १३४ १२५ बलाध्यक्षः पुरो १८६ ७० । म. बलिना सह योद्धव्यं १७७ ४६ । मज्जन्नपि पयोराशौ १४४ १५४ बलिना सह योद्धव्यं २३० २६ । मणिर्लुठति पादेषु १०६ ६८ बलीयसाभियुक्तस्तु २५६ १०५ । मतिरेव बलाद्गरीयसी ११३ ८६

  • हि० १८
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१० $\qquad\qquad\qquad\qquad$ हितोपदेशकी $\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ पृ० $\quad$ श्लो० $\quad\vert\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पृ० $\quad$ श्लो० मतिर्दोलायते सत्यं $\qquad$ २३७ $\quad$ ५३ $\quad\vert$ मित्रं प्राप्नुत सज्जना $\qquad$ ८३ $;;$ २१६ मत्तः प्रमत्तश्चोन्मत्तः $\qquad$ २३९ $\quad$ ५५ $\quad\vert$ मित्रं प्रीतिरसायनं $\qquad$ ८१ $;;$ २१४ मदोद्धतस्य नृपतेः $\qquad$ २२७ $\quad$ १६ $\quad\vert$ मित्रलाभः सुहृद्भेदो $\qquad$ २ $\qquad$ ९ मनस्यन्यद्वचस्यन्यद् $\quad;;;$ ४५ $;;$ १०१ $\quad\vert$ मित्रामात्यसुहृद्दुर्गा $\quad;;;$ १८५ $\quad$ ६५ मनस्वी म्रियते कामं $\quad;;;$ ५६ $;;$ १३३ $\quad\vert$ मुकुटे रोपितः $\qquad\quad$ १०७ $\quad$ ७३ मनुष्यजातौ तुल्यायां $\quad;;;$ ९७ $\quad$ ३९ $\quad\vert$ मुदं विषादः शरदं $\qquad$ २०२ $;;$ ११८ मन्त्रबीजमिदं गुप्तं $\qquad$ २४० $;;$ १४५ $\quad\vert$ मुहुर्नियोगिनो बाध्या $\quad$ १२० $;;$ १०६ मन्त्रभेदेऽपि ये दोषाः $\quad$ १७४ $\quad$ ३७ $\quad\vert$ मूर्खः स्वल्पव्ययत्रासात् $;$ २०५ $;;$ १२५ मन्त्रिणां भिन्नसंधाने $\quad;;$ १०४ $;;$ १२१ $\quad\vert$ मूर्खोऽपि शोभते तावत् $\quad;;;$ ९ $\quad$ ४० मन्त्रिणा पृथिवीपाल $\quad;;$ १४९ $;;$ १६७ $\quad\vert$ मूलं भुजङ्गैः कुसुमानि $;$ १४७ $;;$ १६३ मन्त्रो योध इवाधीरः $\quad;;$ १४० $;;$ १४७ $\quad\vert$ मूलभृत्यान् परित्यज्य $\quad$ १३७ $;;$ १३६ मयास्योपकृतं पूर्वं $\qquad$ २५८ $;;$ ११४ $\quad\vert$ मृगतृष्णासमं $\qquad\quad$ २६० $;;$ १०९ मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः $\quad;;;$ १६ $\quad$ ११ $\quad\vert$ मृतः प्राप्नोति वा स्वर्गं $;$ १४९ $;;$ १६९ मर्तव्यमिति यद्दुःखं $\quad;;;$ ३५ $\quad$ ६७ $\quad\vert$ मृद्घटवत्सुखभेद्यो $\qquad$ ४३ $\quad$ ९२ महताप्यर्थसारेण $\qquad;;;$ ४३ $\quad$ ९१ $\quad\vert$ मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुः $\quad$ ९१ $\quad$ २६ महतो दूरभीरुत्वं $\qquad$ १७६ $\quad$ ४४ $\quad\vert\qquad\qquad\qquad$ य. महत्यल्पेऽप्युपायज्ञः $\quad;;$ १७७ $\quad$ ४९ $\quad\vert$ यः काकिनीमप्यपथ- महानप्यल्पतां याति $\quad;;$ १६१ $\quad$ १२ $\quad\vert$ $\quad$ प्रपन्नां $\qquad\qquad\quad$ २०५ $;;$ १२३ महीभुजो मदान्धस्य $\quad;;$ २०७ $;;$ १३४ $\quad\vert$ यः कुर्यात्सचिवायत्तां $\quad$ १३६ $;;$ १३० माता मित्रं पिता चेति $\quad;;;$ २४ $\quad$ ३८ $\quad\vert$ यः कुलाभिजनाचारैः $\quad;;;$ ७६ $;;$ २०३ माता शत्रुः पिता वैरी $\qquad$ ˮ $\quad$ ३८ $\quad\vert$ यः स्वभावो हि $\qquad\quad$ १८१ $\quad$ ५८ मातृपितृकृताभ्यासो $\qquad$ ८ $\quad$ ३७ $\quad\vert$ यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मातृवत् परदारेषु $\qquad;;;$ १७ $\quad$ १४ $\quad\vert$ $\quad$ मनुष्यैः $\qquad\qquad\quad$ ९८ $\quad$ ४३ मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा $\quad$ ५२ $;;$ ११६ $\quad\vert$ यत्र तत्र हतः शूरः $\qquad$ २१३ $;;$ १४८ मार्जारो महिषो मेषः $\quad;;;$ ४२ $\quad$ ८७ $\quad\vert$ यत्र भूम्येकदेशेन $\qquad$ २५९ $;;$ ११९ मांसमूत्रपुरीषास्थि $\quad;;;$ २७ $\quad$ ४७ $\quad\vert$ यत्र राजा तत्र कोशो $\quad;;$ १८७ $\quad$ ७७ मासमेकं नरो याति $\quad;;;$ ६४ $;;$ १३७ $\quad\vert$ यत्र विद्वज्जनो नास्ति $\quad;;;$ ३६ $\quad$ ६९ $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\vert$ यत्रायुद्धे ध्रुवं मृत्युः $\quad;;$ १४९ $;;$ १७०