हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे
-१३ ] महदाश्रयकी प्रशंसा १६१ शृणु,— सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः । यदि दैवात्फलं नास्ति च्छाया केन निवार्यते ? ॥ १० ॥ सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे फल ( प्राप्य ) नहीं है तो छायाको कौन भला दूर कर सकता है ? ॥ १० ॥ अन्यच्च,— हीनसेवा न कर्तव्या कर्तव्यो महदाश्रयः । पयोऽपि शौण्डिकीहस्ते वारुणीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ और दूसरे—नीचकी सेवा नहीं करनी चाहिये, बडे पुरुषोंका आश्रय करना चाहिये, जैसे कलारिनके हाथमें दूधकोभी लोग वारुणी ( शराब ) समझते हैं ११ अन्यच्च,— महानप्यल्पतां याति निर्गुणे गुणविस्तरः । आधाराधेयभावेन गजेन्द्र इव दर्पणे ॥ १२ ॥ और गुणहीनमें बड़ा गुणका कहना भी लघुताको प्राप्त होता है, जैसे आधार और आधेयभावसे दर्पणमें हाथीका प्रतिबिंब छोटा दीखता है ॥ १२ ॥ विशेषतश्च,— व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यादतिशक्ते नराधिपे । शशिनो व्यपदेशेन शशकाः सुखमासते' ॥ १३ ॥ और विशेष करके राजाके सबल होने पर उसके छल(बहाने)सेभी कार्य सिद्ध हो जाता है । जैसे चन्द्रमाके छल(बहाने)से खरगोश सुखसे रहने लगे' ॥ १३ ॥ मयोक्तम्—'कथमेतत् ?' । पक्षिणः कथयन्ति— मैंने कहा-'यह कथा कैसी है ?' पक्षी कहने लगे ।— कथा ४ [ हाथियोंका झुंड और बूढे शशककी कहानी ४ ] 'कदाचिदपि वर्षासु वृष्टेरभावात्तृषार्तो गजयूथो यूथपति- माह—'नाथ ! कोऽभ्युपायोऽस्माकं जीवनाय ? नास्ति क्षुद्रजन्तूनां १ जिसमें वस्तु रक्खी जाय. २ वस्तु. हि० ११
१६२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४- निमज्जनस्थानम् । वयं च निमज्जनस्थानाभावान्मृतार्हा इव । किं कुर्मः ? क्व यामः ?' । ततो हस्तिराजो नातिदूरं गत्वा निर्मलं ह्रदं दर्शितवान् । ततो दिनेषु गच्छत्सु तत्तीरावस्थिता गजपादाहतिभिश्चूर्णिताः क्षुद्रशशकाः ।' अनन्तरं शिलीमुखो नाम शशकश्चिन्तयामास—'अनेन गजयूथेन पिपासाकुलितेन प्रत्यहमत्रागन्तव्यम् । अतो विनश्यत्यस्मत्कुलम् ।' ततो विजयो नाम वृद्धशशकोऽवदत्—'मा विषीदत । मयात्र प्रतीकारः कर्तव्यः ।' ततोऽसौ प्रतिज्ञाय चलितः । गच्छता च तेनालोचि- तम्—'कथं गजयूथसमीपे स्थित्वा वक्तव्यम् ? किसी समय वर्षाके मोसममें वर्षा न होनेसे प्यासके मारे हाथियोंका झुंड अपने स्वामीसे कहने लगा—'हे स्वामी ! हमारे जीनेके लिये अब कौनसा उपाय है ? छोटे छोटे जन्तुओंको नहानेके लिये भी स्थान नहीं है । और हम तो स्नानके लिये स्थान न होनेसे मरेके समान हैं । क्या करें ? कहाँ जायँ ?' हाथियोंके राजाने समीपही जो एक निर्मल सरोवर था वहां जा कर दिखा दिया । फिर कुछ दिन बाद उस सरोवरके तीर पर रहने वाले छोटे छोटे शशक हाथियोंके पैरोंकी रेलपेलसे खुँद गये । पीछे शिलीमुख नाम शशक सोचने लगा—'प्यासके मारे यह हाथियोंका झुंड, यहाँ नित्य आवेगा, इसलिये हमारा कुल तो नष्ट हो जायगा'. फिर विजय नाम एक बूढ़े शशकने कहा—'खेद मत करो। मैं इसका उपाय करूँगा । फिर वह प्रतिज्ञा करके चला गया । और चलते चलते इसने सोचा—'कैसे हाथियोंके झुंडके पास खड़े हो कर बात चीत करनी चाहिये ? यतः,— स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः । पालयन्नपि भूपालः प्रहसन्नपि दुर्जनः ॥ १४ ॥ क्योंकि—हाथी ( स्पर्शसेभी ) छूताही, साँप सूंघताही, राजा रक्षा करता हुआभी, और दुर्जन हँसता हुआभी मार डालता है ॥ १४ ॥ अतोऽहं पर्वतशिखरमारुह्य यूथनाथं संवादयामि ।' तथाऽनुष्ठिते यूथनाथ उवाच—'कस्त्वम् ?, कुतः समायातः ?' । स ब्रूते— 'शशकोऽहम् । भगवता चन्द्रेण भवदन्तिकं प्रेषितः ।' यूथपति- राह—'कार्यमुच्यताम् ।'
-१५] दूतकी सत्यप्रियता १६३ इसलिये मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ कर झुंडके स्वामीसे अच्छी प्रकारसे बोलूँ ।' ऐसा करने पर झुंडका स्वामी बोला—'तू कौन है ? कहाँसे आया है ?' वह बोला—'मैं शशक हूँ । भगवान् चन्द्रमाने आपके पास भेजा है ।' झुंडके स्वामीने कहा—'क्या काम है बोल ।' विजयो ब्रूते— 'उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा । सदैवांवध्यभावेन यथार्थस्य हि वाचकः ॥ १५ ॥ विजय बोला—'मारनेके लिये शस्त्र उठाने पर भी दूत अनुचित नहीं करता है, क्योंकि सब कालमें नहीं मारे जानेसे ( मृत्युकी भीति न होनेसे ) वह निश्चय करके सच्ची ही बात बोलने वाला होता है ॥ १५ ॥ तदहं तदाज्ञया ब्रवीमि । शृणु, यदेते चन्द्रसरोरक्षकाः शशका- स्त्वया निःसारितास्तदनुचितं कृतम् । ते शशकाश्चिरमस्माकं रक्षिताः । अत एव मे शशाङ्क इति प्रसिद्धिः ।' एवमुक्तवति दूते यूथपतिर्भयादिदमाह—'प्रणिधेहि । इदमज्ञानतः कृतम् । पुनर्न कर्तव्यम् ।' दूत उवाच—'यद्येवं तदत्र सरसि कोपात्कम्प- मानं भगवन्तं शशाङ्कं प्रणम्य प्रसाद्य गच्छ ।' ततो रात्रौ यूथपतिं नीत्वा जले चञ्चलं चन्द्रबिम्बं दर्शयित्वा यूथपतिः प्रणामं कारितः । उक्तं च तेन—'देव ! अज्ञानादनेनापराधः कृतः, ततः क्षम्यताम् । नैवं वारान्तरं विधास्यते' इत्युक्त्वा प्रस्थापितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"व्यपदेशोऽपि सिद्धिः स्यात्” इति । ततो मयोक्तम्—'स एवास्मत्प्रभू राजहंसो महाप्रतापो- ऽतिसमर्थः। त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं तत्र युज्यते, किं पुना राज्यम् ?' इति । तदाऽहं तैः पक्षिभिः 'दुष्ट ! कथमस्मद्भू मौ चरसि ?' इत्य- भिधाय राज्ञश्चित्रवर्णस्य समीपं नीतः । ततो राज्ञः पुरो मां, १ 'साधुर्वा यदि वाऽसाधुः परैरेश समर्पितः । ब्रुवन् परार्थं परवान् न दूतो वधमर्हति' ( सुं. का. ५२-२१) भावार्थ यह है कि, दूत पराया ( एवं दूसरेका आज्ञावश ) होनेसे भला-बुरा बोलने पर भी वह सदैव अवध्य है.
१६४ हितोपदेशः [ विग्रहः १६- प्रदर्श्य तैः प्रणम्योक्तम्—'देव ! अवधीयतामेष दुष्टो बको यदस्मद्देशे चरन्नपि देवपादानधिक्षिपति ।' राजाह—'कोऽयम् ? कुतः समायातः ?' । त ऊचुः—'हिरण्यगर्भनाम्नो राजहंसस्यानु- चरः कर्पूरद्वीपादागतः ?' । अथाहं गृध्रेण मन्त्रिणा पृष्टः—'कस्तत्र मुख्यो मन्त्री ?' इति । मयोक्तम्—'सर्वशास्त्रार्थपारगः सर्वज्ञो नाम चक्रवाकः ।' गृध्रो ब्रूते—'युज्यते, स्वदेशजोऽसौ । इसलिये मैं उनकी आज्ञासे कहता हूँ । सुनिये, जो ये चन्द्रमाके सरोवरके रखवाले शशकोंको आपने निकाल दिया है यह अनुचित किया । वे शशक हमारे बहुत दिनसे रक्षित हैं इसीलिये मेरा नाम “शशांक” प्रसिद्ध है । दूतके ऐसा कहतेही हाथियोंका स्वामी भयसे यह बोला-‘सोच लो, यह बात अनजानपन की है । फिर नहीं करूँगा ।' दूतने कहा-‘जो ऐसा है तो इस सरोवरमें क्रोधसे काँपते हुए भगवान् चन्द्रमाजीको प्रणाम कर, और प्रसन्न करके चला जा । फिर रातको झुंडके स्वामीको ले जा कर और जलमें हिलते हुए चन्द्रमाके गोलेको दिखवा कर झुंडके स्वामीसे प्रणाम कराया और इसने कहा-‘हे महाराज ! भूलसे इसने अपराध किया है इसलिये क्षमा कीजिये, फिर दूसरी बार नहीं करेगा', यह कह कर बिदा किया । इसलिये मैं कहता हूँ—“छलसेभी काम सिद्ध हो जाता है ।” फिर मैंने कहा-‘वह हमारा स्वामी राजहंस तो बड़ा प्रतापी और अत्यन्त समर्थ है । तीनों लोककीभी प्रभुता उसके योग्य है, फिर यह राज्य क्या है ? तब वे पक्षी मुझे “हे दुष्ट ! हमारी भूमिमें क्यों बसता है ?” यह कह कर चित्रवर्ण राजाके पास ले गये । फिर राजाके सामने मुझे दिखला कर उन्होंने प्रणाम करके कहा-‘महाराज ! ध्यान दे कर सुनिये । यह दुष्ट बगुला हमारे देशमें बसता हुआभी आपकी निन्दा करता है ।' राजा बोला-‘यह कौन है ? कहाँसे आया है ?' वे कहने लगे-‘हिरण्यगर्भ नाम राजहंसका अनुचर कर्पूरद्वीपसे आया है' । फिर गिद्ध मंत्रीने मुझसे पूछा-‘वहाँ मुख्य मंत्री कौन है ?' मैंने कहा-‘सब शास्त्रोंको पढ़ा हुआ सर्वज्ञ नाम चकवा है ।' गिद्ध बोला- ठीक है । वह स्वदेशी है; यतः,— स्वदेशजं कुलाचारं विशुद्धमुपधाशुचिम् । मन्त्रज्ञमव्यसनिनं व्यभिचारविवर्जितम् ॥ १६ ॥
-१८ ] मन्त्रीका लक्षण, राजा आदिकोका अप्राप्य चाहना १६५ क्योंकि—स्वदेशी, कुलकी रीतिमें निपुण, धर्मशील अर्थात् उत्कोच (रिशबत) आदिको नहीं लेने वाला, विचार करनेमें चतुर, द्यूत, पान आदि व्यसन तथा व्यभिचारसे रहित ॥ १६ ॥ अधीतव्यवहारार्थं मौलं ख्यातं विपश्चितम् । अर्थस्योत्पादकं चैव विदध्यान्मन्त्रिणं नृपः' ॥ १७ ॥ युद्ध इत्यादि व्यवहारको जानने वाला, कुलीन, विख्यात पण्डित, धन उत्पन्न करने वाला ऐसेको राजा मंत्री बनावे' ॥ १७ ॥ अत्रान्तरे शुकेनोक्तम्—'देव ! कर्पूरद्वीपादयो लघुद्वीपा जम्बु- द्वीपान्तर्गता एव । तत्रापि देवपादानामेवाधिपत्यम्' । ततो राज्ञाप्युक्तम्—'एवमेव । इस अवसरमें तोतेने कहा-'महाराज ! कर्पूरद्वीप आदि छोटे छोटे द्वीप जम्बूद्वीपकेही भीतर हैं और वहाँभी महाराजकाही राज्य है ।' राजाभी फिर बोला-'ऐसाही है; यतः,— राजा मत्तः शिशुश्चैव प्रमादी धनगर्वितः । अप्राप्यमपि वाञ्छन्ति किं पुनर्लभ्यतेऽपि यत्' ॥ १८ ॥ क्योंकि—राजा, विक्षिप्त, बालक, प्रमादी, धन का अहंकारी, ये दुर्लभ वस्तु- कीभी इच्छा किया करते हैं, फिर जो मिल सकती है उसका तो कहनाही क्या है ? ॥ १८ ॥ ततो मयोक्तम्—'यदि वचनमात्रेणैवाधिपत्यं सिद्ध्यति तदा जम्बुद्वीपेऽप्यस्मत्प्रभोर्हिरण्यगर्भस्य स्वाम्यमस्ति ।' शुको ब्रूते— 'कथमत्र निर्णयः ?' । मयोक्तम्—'संग्राम एव ।' राज्ञा विहस्यो- क्तम्—'स्वस्वामिनं गत्वा सजीकुरु ! तदा मयोक्तम्—'स्वदूतोऽपि प्रस्थाप्यताम् ।' राजोवाच—'कः प्रयास्यति दौत्येन ? यत एवंभूतो दूतः कार्यः,— फिर मैंने कहा कि, जो केवल कहनेसेही राज्य सिद्ध हो जाता है तो जम्बूद्वीपमेंभी हमारे स्वामी हिरण्यगर्भका राज्य है ।' तोता बोला—'इसमें कैसे निर्णय हो ?' मैंने कहा—'संग्रामही है ।' राजाने हँस कर कहा-'अपने स्वामीको
१६६ हितोपदेशः [ विग्रहः १९- जा कर तयार कर।' तब मैंने कहा—'अपने दूतकोभी भेजिये।' राजाने कहा- 'दूत बन कर कौन जायगा ? क्योंकि ऐसा दूत करना चाहिये;— भक्तो गुणी शुचिर्दक्षः प्रगल्भोऽव्यसनी क्षमी । ब्राह्मणः परमर्मज्ञो दूतः स्यात्प्रतिभानवान्' ॥ १९ ॥ भक्त अर्थात् राजाका हितकारी, गुणवान्, शुद्ध अर्थात् उत्कोच (रिशबत) आदि लाभरहित, कार्यमें चतुर, बोल-चालमें निपुण, द्यूत, पान आदि व्यसनसे रहित, क्षमाशील, ब्राह्मण, शत्रुके भेदको जानने वाला और बुद्धिमान् दूत होना चाहिये ॥ १९ ॥ गृध्रो वदति—'सन्त्येव दूता बहवः । किंतु ब्राह्मण एव कर्तव्यः । सिद्ध बोला—'दूत तो बहुतसे हैं परन्तु ब्राह्मणकोही करना चाहिये । यतः,— प्रसादं कुरुते पत्युः संपत्तिं नाभिवाञ्छति । कालिमा कालकूटस्य नापैतीश्वरसंगमात्' ॥ २० ॥ क्योंकि-वह स्वामीको प्रसन्न करता है और संपत्तिको नहीं चाहता है, और जैसे महादेवजीके संगसे विषका कालापन नहीं जाता है वैसेही इसकीभी प्रकृति नहीं बदलती है ॥ २० ॥ राजाह—'ततः शुक एव व्रजतु । शुक ! त्वमेवानेन सह गत्वा- स्मदभिलषितं ब्रूहि ।' शुको ब्रूते—'यथाज्ञापयति देवः । किन्त्वयं दुर्जनो बकः । तदनेन सह न गच्छामि ॥ राजा बोला-'फिर तोताही जाय; हे तोते ! तूही इसके साथ वहाँ जा कर हमारा इष्ट (संदेशा) कह दे।' तोता बोला—'जो आज्ञा श्रीममहाराजकी । पर यह बगुला दुष्ट है। इसलिये इसके साथ नहीं जाऊँगा। तथा चोक्तम्,— खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फलति साधुषु । दशाननोऽहरत्सीतां बन्धनं स्यान्महोदधेः ॥ २१ ॥ जैसा कहा है—दुष्ट जो बुराई करता है वह बुराई सचमुच साधुओं पर फलती (असर करती) है, अर्थात् उन्हें दुःख भुगतना पड़ता है। जैसे रावण सीताको हर ले गया पर समुद्र बाँधा गया ॥ २१ ॥
राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' तोता कहने लगा ।—
-२२ ] दुर्जनके साथ सहवास करनेका फल १६७ अपरं च,— न स्थातव्यं न गन्तव्यं दुर्जनेन समं क्वचित् । काकसङ्गाद्धतो हंसस्तिष्ठन् गच्छंश्च वर्तकः ॥ २२ ॥' और दूसरे-दुष्टके साथ कभी न तो बैठना चाहिये और न जाना चाहिये, जैसे कौएके साथ रह कर हंस और उड़ता हुआ बटेर मारे गये' ॥ २२ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । शुकः कथयति— राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' तोता कहने लगा ।— कथा ५ [ हंस, कौआ और एक मुसाफिरकी कहानी ५ ] 'अस्त्युज्जयिनीवर्त्मप्रान्तरे प्लक्षतरुः । तत्र हंसकाकौ निवसतः । कदाचिद्ग्रीष्मसमये परिश्रान्तः कश्चित्पथिकस्तत्र तरुतले धनुः- काण्डं संनिधाय सुप्तः । तत्र क्षणान्तरे तन्मुखाद्वृक्षच्छायापगता । ततः सूर्यतेजसा तन्मुखं व्याप्तमवलोक्य तद्वृक्षस्थितेन हंसेन कृपया पक्षौ प्रसार्य पुनस्तन्मुखे छाया कृता । ततो निर्भरनिद्रासुखिना तेन मुखव्यादानं कृतम् । अथ परसुखमंसहिष्णुः स्वभावदौर्जन्येन स काकस्तस्य मुखे पुरीषोत्सर्गं कृत्वा पलायितः । ततो यावदसौ पान्थ उत्थायोर्ध्वं निरीक्षते तावत्तेनावलोकितो हंसः काण्डेन हतो व्यापादितः ॥ वर्तककथामपि कथयामि— 'उज्जयिनीके मार्गमें एक पाकड़का पेड़ था । उस पर हंस और काग रहते थे । एक दिन गरमीके समय थका हुआ कोई मुसाफिर उस पेड़के नीचे धनुषबाण धरके सो गया । वहाँ थोड़ी देरमें उसके मुख परसे वृक्षकी छाया ढल गई । फिर सूर्यके तेजसे उसके मुखको तचका हुआ देख कर उस पेड़ पर बैठे हुए हंसने दया विचार पंखोंको पसार फिर उसके मुख पर छाया कर दी । फिर गहरी नींदके आनन्दसे उसने मुख फाड़ दिया । पीछे पराये सुखको नहीं सहने वाला वह काग दुष्ट स्वभावसे उसके मुखमें बीट करके उड़ गया । फिर जो उस बटोहीने उठ कर ऊपर जब देखा तब हंस दीख पड़ा, उसे बाण मारा उसे बाणसे मार दिया और वह मर गया ॥ मुसाफिरकी कथा भी कहता हूँ ।
कथा ६
१६८ हितोपदेशः [ विग्रहः २३- कथा ६ [ काक, मुसाफिर और एक ग्वालेकी कहानी ६ ] एकदा भगवतो गरुडस्य यात्राप्रसंगेन सर्वे पक्षिणः समुद्रतीरं गताः । ततः काकेन सह वर्तकश्चलितः । अथ गोपालस्य गच्छतो दधिभाण्डाद्वारंवारं तेन काकेन दधि खाद्यते । ततो यावदसौ दधिभाण्डं भूमौ निधायोर्ध्वमवलोकते तावत्तेन काकवर्तकौ दृष्टौ । ततस्तेन खेदितः काकः पलायितः । वर्तकः स्वभावानिर- पराधो मन्दगतिस्तेन प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“न स्थातव्यं न गन्तव्यम्” इत्यादि ॥ ततो मयोक्तम्—'भ्रातः शुक ! किमेवं ब्रवीषि ? मां प्रति यथा श्रीमद्देवस्तथा भवानपि ।' शुकेनोक्तम्—'अस्त्वेवम् । एक समय गरुड़जीकी यात्राके निमित्तसे सब पक्षी समुद्रके तीर पर गये । फिर कौएके साथ एक मुसाफिरभी चला । पीछे जाते हुए अहीरकी दहीकी हाँडीमेंसे बार बार कौआ दही खाने लगा । फिर जब इसने दहीकी हाँडीको धरती पर रख कर ऊपर देखा तब उसको कौआ और बटेर दीख पड़े । फिर उससे खदेड़ा हुआ कौआ उड़ गया । और स्वभावसे अपराधहीन हौले हौले जाने वाले मुसाफिरको उसने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ- “न बैठना चाहिये और न जाना चाहिये” इत्यादि । फिर मैंने कहा-‘भाई तोते ! क्यों ऐसे कहते हो ? मुझे तो जैसे श्रीमद्महाराज हैं वैसेही तुम हो ।' तोतेने कहा-‘ऐसेही ठीक है । किन्तु,— दुर्जनैरुच्यमानानि संमतानि प्रियाण्यपि । अकालकुसुमानीव भयं संजनयन्ति हि ॥ २३ ॥ परन्तु—दुष्टोंसे कहे हुए वचन चाहे जैसे अच्छे और प्यारे हों, वे कुऋतुके ( बिना मोसमके ) पुष्पोंके समान भय उत्पन्न करतेही हैं ॥ २३ ॥ दुर्जनत्वं च भवतो वाक्यादेव ज्ञातं यदनयोर्भूपालयोर्विग्रहे भवद्वचनमेव निदानम् । और तेरा दुष्टपणा तो तेरी बातसेही जान लिया गया कि इन राजाओंके युद्धमें तेरा वचनही मूल कारण है ।
राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' तोता कहने लगा—
- २४ ] मीठे भाषणसे मूर्खकी प्रसन्नता १६९ पश्य,— प्रत्यक्षोऽपि कृते दोषे मूर्खः सान्त्वेन तुष्यति । रथकारो निजां भार्यां सजारं शिरसाऽकरोत्' ॥ २४ ॥ देखो—मूर्ख सामने किये हुए दोषको देख कर भी मीठे मीठे वचनोंसे प्रसन्न हो जाता है, जैसे एक बढ़ईने यारसमेत अपनी स्त्रीको सिर पर धर लिया' ॥२४॥ राजोक्तम्—'कथमेतत् ?' । शुकः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' तोता कहने लगा— कथा ७ [ एक बढई, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और यारकी कहानी ७ ] 'अस्ति यौवनश्रीनगरे मन्दमतिर्नाम रथकारः । स च स्वभार्यां बन्धकीं जानाति । जारेण समं स्वचक्षुषा नैकस्थाने पश्यति । ततोऽसौ रथकारः 'अहमन्यं ग्रामं गच्छामि' इत्यु- क्त्वा चलितः । कियद्दूरं गत्वा पुनरागत्य पर्यङ्कतले स्वगृहे निभृतं स्थितः । अथ 'रथकारो ग्रामान्तरं गतः' इत्युपजात- विश्वासः स जारः संध्याकाल एवागतः । पश्चात्तेन समं तस्मिन्पर्यङ्के क्रीडन्ती पर्यङ्कतलस्थितस्य भर्तुः किंचिदङ्गस्पर्शा- त्स्वामिनं मायाविनमिति विज्ञाय विषण्णाऽभवत् । ततो जारेणो- क्तम्—'किमिति त्वमद्य मया सह निर्भरं न रमसे ? विस्मितेव प्रतिभासि मे त्वम्' । तयोक्तम्—'अनभिज्ञोऽसि । मम प्राणेश्वरो येन ममाकौमारं सख्यं सोऽद्य ग्रामान्तरं गतः । तेन विना सकलजनपूर्णोऽपि ग्रामो मां प्रत्यरण्यवद्भाति । 'किं भावि, तत्र परस्थाने, किं खादितवान्, कथं वा प्रसुप्तः' इत्यस्मद्धृदयं विदीर्यते ।' जारो ब्रूते—'तव किमेवं स्नेहभूमी रथकारः ?' बन्धक्यवदत्— 'रे बर्बर ! किं वदसि ? 'यौवनश्रीनगरमें मंदमति नाम बढ़ई रहता था, और वह अपनी स्त्रीको व्यभिचारिणी समझता था । पर यारके संग अपनी आँखोंसे एक स्थानमें नहीं देखता था । बाद यह बढ़ई “मैं दूसरे गाँवको जाता हूँ” यह कह कर चला गया । थोड़ी दूर जा कर और फिर लौट आ कर पलंगके नीचे अपने घरमें छुप कर
१७० हितोपदेशः [ विग्रह २५- बैठ गया । फिर, 'बढ़ई दूसरे गाँवको गया' इस विश्वासके मारे वह यार दिन डूबतेही आ गया । पीछे उसके साथ उसी पलंग पर क्रीड़ा करती हुई पलंगके नीचे बैठे हुए स्वामीकी देहके (स्वल्पसा) छूजानेसे स्वामीको छलिया जान कर उदास हो गई । तब यारने कहा-'क्या बात है ? तू आज मेरे साथ जी खोल कर नहीं रमण करती है ? तू मुझे कुछ दुचित्ती-सी समझ पड़ती है।' उसने कहा-'तू नहीं जानता है । मेरा प्राणप्यारा कि जिसके साथ मेरी बाल्यावस्थासे प्रीति है सो आज दूसरे गाँवको गया है। उसके बिना सब जनोंसे भरा हुआभी यह गाँव मुझे अरण्य-सा जान पड़ता है । क्या होनहार है, वहाँ दूसरे स्थानमें क्या खाया होगा अथवा कैसे सोया होगा इस सोचसे मेरा हिरदा फटा जा रहा है ।' यारने कहा-'क्या तेरा बढ़ई ऐसा स्नेह करने वाला है ?' व्यभि- चारिणी स्त्री बोली-'अरे धूर्त ! क्या पूछता है ? शृणु,— परुषाण्यपि या प्रोक्ता दृष्टा या क्रोधचक्षुषा । सुप्रसन्नमुखी भर्तुः सा नारी धर्मभागिनी ॥ २५ ॥ सुन—पुरुष चाहे वैसे निष्ठुर वचन स्त्रीसे कहे और क्रोधकी आँखसे देखे परंतु पतिके सामने मुखको जो प्रसन्न रक्खे वह स्त्री ही धर्मकी अधिकारिणी है ॥ २५ ॥ अपरं च,— नगरस्थो वनस्थो वा पापो वा यदि वा शुचिः । यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः ॥ २६ ॥ और दूसरे–नगरमें रहे, अथवा वनमें रहे, पापी हो अथवा पुण्यात्मा हो जिन स्त्रियोंको पति प्यारा है उन्हींका संसारमें बड़ा भाग्योदय है ॥ २६ ॥ अन्यच्च,— भर्ता हि परमं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । एषा विरहिता तेन शोभनापि न शोभना ॥ २७ ॥ और स्त्रियोंका भूषणोंके विनाही पति परम भूषण है, उससे रहित यह स्त्री रूपवतीभी कुरूपा है ॥ २७ ॥
-३०] छिपा हुआ पतिको जान कर यारसे भाषण १७१ त्वं जारः पापमतिः । मनोलौल्यात्पुष्पताम्बूलसदृशः कदाचि- त्सेव्यसे कदाचिन्न सेव्यसे च । स च स्वामी मां विक्रेतुं देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्योऽपि दातुमीश्वरः । किं बहुना, तस्मिञ्जीवति जीवामि, तन्मरणे चानुमरणं करिष्यामीति प्रतिज्ञा वर्तते । तू तो पापबुद्धी है । चित्तकी चंचलतासे पुष्प-तांबूलके समान है, कभी सेवा किया जाता है और कभी नहीं किया जाता है । और वह स्वामी मुझे बेचनेके लिये और देवता और ब्राह्मणोंको देनेके लियेभी समर्थ है । अधिक क्या कहूँ ? उसके जीते मैं जीती हूँ, उसके मरने पर सती हो जाऊँगी यह मेरी प्रतिज्ञा है । यतः,— तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च यानि लोमानि मानवे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं याऽनुगच्छति ॥ २८ ॥ क्योंकि-जो स्त्री पतिकी आज्ञामें चलती है वह, मनुष्य ( शरीर ) के ऊपर जो तीन करोड़ पचास लाख लोम ( रोंगटे ) हैं उतने वर्ष तक स्वर्गमें वसती है ॥ अन्यच्च,— व्यालग्राही यथा व्यालं बलादुद्धरते बिलात् । तद्वद्भर्तारमादाय स्वर्गलोके महीयते ॥ २९ ॥ और दूसरे-जैसे मदारी ( मन्त्रके प्रभावसे ) साँपको बिलसे बलसे खींचता है वैसेही स्त्री ( पतिव्रतके प्रभावसे ) पतिको स्वर्गलोकमें ले जा कर सुख भोगती है ॥ अपरं च,— चितौ परिष्वज्य विचेतनं पतिं प्रिया हि या मुञ्चति देहमात्मनः । कृत्वापि पापं शतसंख्यमप्यसौ पतिं गृहीत्वा सुरलोकमाप्नुयात्' ॥ ३० ॥ और-जो स्त्री चितामें अपने मरे हुए भर्ताको गोदमें ले कर अपने शरीरको छोड़ती ( सती हो जाती ) है वह सौ पाप करकेभी पतिको ले कर स्वर्गलोकको जाती है' ॥ ३० ॥
१७२ हितोपदेशः [ विग्रहः ३१- एतत्सर्वं श्रुत्वा स रथकारोऽवदत्—'धन्योऽहं यस्येदृशी प्रिय- वादिनी स्वामिवत्सला भार्या' इति मनसि निधाय तां खद्वां स्त्रीपुरुषसहितां मूर्ध्नि कृत्वा सानन्दं ननर्त । अतोऽहं ब्र- वीमि—“प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे” इत्यादि ॥ ततोऽहं तेन राज्ञा यथाव्यवहारं संपूज्य प्रस्थापितः । शुकोऽपि मम पश्चादागच्छ- न्नास्ते । एतत्सर्वं परिज्ञाय यथाकर्तव्यमनुसंधीयताम् ।' चक्र- वाको विहस्याह—'देव ! बकेन तावद्देशान्तरमपि गत्वा यथा- शक्ति राजकार्यमनुष्ठितम् । किंतु देव ! स्वभाव एष मूर्खाणाम् । यह सब सुन कर वह बढ़ई बोला-'मैं धन्य हूँ जिसकी ऐसी मिष्टभाषिणी स्वामीको प्यार करने वाली स्त्री है। यह मनमें ठान, उन स्त्रीपुरुषसहित खाटको सिर पर रख कर वह आनन्दसे नाचने लगा। इसलिये मैं कहता हूँ-“प्रत्यक्ष दोष किये जाने परभी" इत्यादि । फिर उस राजाने वहाँकी रीतिके अनुसार तिलक कर मुझे बिदा किया। तोताभी मेरे पीछे पीछे आ रहा है । यह सब बात जान कर जो करना है सो करिये । चकवेने हँस कर कहा-'महाराज ! बगुलेने प्रदेश जा कर भी शक्तिके अनुसार राजकार्य किया, परन्तु महाराज ! मूर्खोंका यही स्वभाव है । यतः,— शतं दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम् । विना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम्' ॥ ३१ ॥ क्योंकि—अपना सैकड़ोंका दान (हानि) करे परन्तु विवाद न करे यह बुद्धिमानोंका मत है, और विना कारणभी कलह कर बैठना यह मूर्खका लक्षण है' ॥ ३१ ॥ राजाह—'किमतीतोपालम्भनेन ? प्रस्तुतमनुसंधीयताम् ।' चक्रवाको ब्रूते—'देव ! विजने ब्रवीमि । राजा बोला-'जो हो गया उसके उलहनेसे क्या (लाभ) है ? अब जो करना है उसे करो ।' चकवा बोला-'महाराज ! एकांतमें कहूँगा । यतः,— वर्णाकारप्रतिध्वानैर्नेत्रवक्त्रविकारतः । अप्यूहन्ति मनो धीरास्तस्माद्रहसि मन्त्रयेत्' ॥ ३२ ॥
- ३४ ] राजाको भेदियेकी आवश्यकता १७३ क्योंकि—रंग, रूप, चेष्टा, खर, नेत्र और मुख इनके बदलनेसे चतुर मनुष्य मनकीभी बात जान लेते हैं इसलिये एकांतमें गुप्त वार्ता करनी चाहिये ॥ ३२ ॥ राजा मन्त्री च तत्र स्थितौ । अन्येऽन्यत्र गताः । चक्रवाको ब्रूते—'देव ! अहमेवं जानामि । कस्याप्यस्मन्नियोगिनः प्रेरणया बकेनेदमनुष्ठितम् । राजा और मंत्री वहाँ रहे । और सब दूसरे स्थानको चले गये । चक्रवा बोला—'हे महाराज ! मैं ऐसा जानता हूं कि किसी हमारेही सेवकके सिखाये भलायेसे बगुलेने यह किया है । यतः,— वैद्यानामातुरः श्रेयान् व्यसनी यो नियोगिनाम् । विदुषां जीवनं मूर्खः सद्वर्णो जीवनं सताम्' ॥ ३३ ॥ क्योंकि—वैद्योंको रोगी लाभदायक है, सेवकोंको द्यूतपानादि व्यसनसे युक्त राजा कल्याणकारी है, पंडितोंका मूर्ख जीवन है, अर्थात् आजीविका देने वाला है, और सत्पुरुषोंका जीवन उत्तम वर्ण है' ॥ ३३ ॥ राजाऽब्रवीत्—'भवतु । कारणमत्र पश्चान्निरूपणीयम् । संप्रति यत्कर्तव्यं तन्निरूप्यताम् ।' चक्रवाको ब्रूते—'देव ! प्रणिधिस्ताव- त्प्रहीयताम् । ततस्तदनुष्ठानं बलाबलं च जानीमः । राजा बोला—'जो कुछ हो, इसमें जो कारण है उसका पीछे निश्चय कर लिया जायगा, अब जो कुछ करना है उसका निर्णय करो ।' चक्रवा बोला—'हे महाराज ! पहले किसी भेदियेको भेजिये, फिर उसका काम और बलाबल जानें । तथा हि,— भवेत्स्वपरराष्ट्राणां कार्याकार्यावलोकने । चारचक्षुर्महीभर्तुर्यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ ३४ ॥ वैसा कहा है—राजाओंका अपने, तथा शत्रुके राज्योंके, अच्छे तथा बुरे कामोंके देखनेके लिये भेदियाही नेत्र ( गूढ मन्त्र जानने वाला ) होता है और जिसके नहीं होता है वह सचमुच अंधाही है ॥ ३४ ॥ स च द्वितीयं विश्वासपात्रं गृहीत्वा यातु । तेनासौ स्वयं तत्रावस्थाय द्वितीयं तत्रत्यमन्त्रकार्यं सुनिभृतं निश्चित्य निगत्य प्रस्थापयति ।
१७४ हितोपदेशः [ विग्रहः ३५- और वह दूसरे विश्वासी पुरुषको साथ ले जाय, जिससे वह आप वहाँ अपनेको ठहरा कर दूसरेको वहाँका मंत्रकार्य गुप्त लगा कर इसको समझा कर बिदा करदे । तथा चोक्तम्,— तीर्थाश्रमसुरस्थाने शास्त्रविज्ञानहेतुना । तपस्विव्यञ्जनोपेतैः स्वचरैः सह संवदेत् ॥ ३५ ॥ जैसा कहा है—तीर्थ, आश्रम और देवताके स्थानमें शास्त्रके ज्ञानके छलसे तपस्वियोंके रूपको धारण किये हुए अपने भेदियोंके द्वारा राजाको शत्रुके राज्यका भेद जानना चाहिये ॥ ३५ ॥ गूढचारश्च यो जले स्थले चरति । ततोऽसावेव बको नियुज्य- ताम्। एतादृश एव कश्चिद्बको द्वितीयत्वेन प्रयातु । तद्गृहलोकाश्च राजद्वारे तिष्ठन्तु, किंतु देव ! एतदपि सुगुप्तमनुष्ठातव्यम् । और गुप्त भेदिया वह है जो जलमें और थलमें जाता है; फिर इस बगुले- कोही नियुक्त कीजिये । ऐसाही कोई दूसरा बगुला जाय । और उसके घरके लोग राजद्वारमें रहें । परंतु हे महाराज ! यह कार्यभी अत्यन्त गुप्त करना चाहिये । यतः,— षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रस्तथा प्राप्तश्च वार्तया । इत्यात्मना द्वितीयेन मन्त्रः कार्यो महीभृता ॥ ३६ ॥ क्योंकि—छः कानमें गुप्त बात जानेसे तथा अन्यसे विदित हुई बात खुल जाती है, इसलिये राजाको केवल एकहीसे अर्थात् अकेले मंत्रीसेही (एकांतमें) विचार करना चाहिये ॥ ३६ ॥ पश्य,— मन्त्रभेदेऽपि ये दोषा भवन्ति पृथिवीपतेः । न शक्यास्ते समाधातुमिति नीतिविदां मतम्' ॥ ३७ ॥ देखो,—हे राजन् ! मन्त्रका भेद खुल जाने पर जो बुराइयाँ होती हैं वे सुधर नहीं सकती हैं यह नीति जानने वालोंका मत है' ॥ ३७ ॥ राजा विमृश्योवाच—‘प्राप्तस्तावन्मयोत्तमः प्रणिधिः ।' मन्त्री ब्रूते—‘तदा संग्रामविजयोऽपि प्राप्तः ।’
-४० ] साम, दान, दण्ड और भेदका महत्त्व १७५ राजा विचार कर बोला—'मुझे भेदिया तो उत्तम मिल गया।' मंत्री बोला— 'तो युद्धमें विजयभी मिला।' अत्रान्तरे प्रतीहारः प्रविश्य प्रणम्योवाच—'देव! जम्बु- द्वीपादागतो द्वारि शुकस्तिष्ठति।' राजा चक्रवाकमालोकते। चक्रवाकेणोक्तम्—'तावद्गत्वावासे तिष्ठतु पश्चादानीय द्रष्टव्यः।' प्रतीहारस्तमावासस्थानं नीत्वा गतः। राजाह—'विग्रहस्तावत्स- मुपस्थितः'। चक्रो ब्रूते—'देव! प्रागेव विग्रहो न विधिः। इस बीचमें द्वारपालने प्रविष्ट हो कर प्रणाम कर कहा—'महाराज! जंबूद्वीपसे आया हुआ तोता द्वार पर बैठा है।' राजाने चक्रवेकी ओर देखा। चकवेने कहा—'पहले जा कर डेरेमें बैठे बाद मुझे ला कर दिखलाना।' द्वारपाल उसे ले कर डेरेको गया; राजा कहने लगा—'लड़ाई तो आ पहुँची।' चकवा बोला—'महाराज! पहलेसेही युद्ध योग्य नहीं है, यतः,— स किंभृत्यः स किंमन्त्री य आदावेव भूपतिम्। युद्धोद्योगं स्वभूत्यागं निर्दिशत्यविचारितम्॥ ३८॥ क्योंकि—जो पहलेही राजाको बिना विचारे युद्धके उद्योगका और अपनी भूमिके त्यागका उपदेश करता है वह निन्दित सेवक तथा निन्दित मंत्री है ३८ अपरं च,— विजेतुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन। अनित्यो विजयो यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः॥ ३९॥ और दूसरे-दोनों युद्ध करने वालोंकी जीत निश्चय नहीं दीखती है इसलिये कभी भी (पहलेही) युद्ध करनेका यत्न न करना चाहिये॥ ३९॥ अन्यच्च,— साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्। साधितुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन॥ ४०॥ और प्रथमतः मीठे वचनसे, धन दे कर और तोड़ फोड़ करके इन तीनोंसे एक साथ ही अथवा अलग अलग शत्रुओंको वश करनेके लिये यत्न करना चाहिये पर युद्धसे कभी न करना चाहिये॥ ४०
१७६ हितोपदेशः [ विग्रहः ४१- अपरं च,— सर्व एव जनः शूरो ह्यनासादितविग्रहः । अदृष्टपरसामर्थ्यः सदर्पः को भवेन्न हि ॥ ४१ ॥ और विग्रह(युद्ध)में गये विना सभी मनुष्य शूर हैं, क्योंकि शत्रु की सामर्थ्य को नहीं जानने वाला ऐसा कौन है जो घमंडी न होय ? ॥ ४१ ॥ किंच,— न तथोत्थाप्यते ग्रावा प्राणिभिर्दारुणा यथा । अल्पोपायान्महासिद्धिरेतन्मन्त्रफलं महत् ॥ ४२ ॥ और पत्थर की शिला जैसी कि काठके यंत्रसे उठाई जाती है ऐसी प्राणियोंसे नहीं उठाई जाती है, इसलिये छोटे उपायसे बड़ा लाभ होना यह बड़े मंत्रका ही फल है ॥ ४२ ॥ किंतु विग्रहमुपस्थितं विलोक्य व्यवह्रियताम् । परंतु विग्रहको उपस्थित देख कर उपाय कीजिये; यतः,— यथा कालकृतोद्योगात्कृषिः फलवती भवेत् । तद्वन्नीतिरियं देव ! चिरात्फलति रक्षणात् ॥ ४३ ॥ क्योंकि—जैसे ठीक समय पर उद्योग करनेसे (अर्थात् हल इत्यादि चलाने तथा बीज बोनेसे ) खेती फलती है वैसेही हे राजा ! यह नीतिभी बहुत काल तक रक्षा करनेसे फलती है ॥ ४३ ॥ अपरं च,— महतो दूरभीरुत्वमासन्ने शूरता गुणः । विपत्तौ च महाँल्लोके धीरतामनुगच्छति ॥ ४४ ॥ और संसारमें बुद्धिमानोंको आपत्तिमें, दूरसे डर लगता है, पास आने पर अपनी शूरताका गुण दिखाते हैं, और महात्मा पुरुष विपत्तिमें धीरज धरते हैं ॥ ४४ ॥ अन्यच्च,— प्रत्यूहः सर्वसिद्धीनामुत्तापः प्रथमः किल । अतिशीतमप्यम्भः किं भिनत्ति न भूभृतः ? ॥ ४५ ॥
-४९ ] नीति जानने वालोंकी प्रशंसा १७७ और दूसरे-किसीके वचनको न सहना यह सब सिद्धियोंका सचमुच मुख्य विघ्न है, जैसे ठंडा जलभी क्या पहाड़को नहीं उखाड़ डालता है ? अर्थात् पुरुषको ठंडे दिलसे दूसरेका वचन सुन लेना चाहिये, फिर योग्य हो सो करें, इस तरह वह जरूर सिद्धि पा सकता है ॥ ४५ ॥ विशेषतश्च महाबलोऽसौ चित्रवर्णो राजा । और विशेष करके वह चित्रवर्ण राजा बड़ा बलवान् है । यतः,— बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् । तद्युद्धं हस्तिना सार्धं नराणां मृत्युमावहेत् ॥ ४६ ॥ इसलिये-बलवान्के साथ लड़ना यह शूरताका चिह नहीं है, क्योंकि मनुष्योंको हाथीके साथ लड़ना मृत्युको पहुँचाता है ॥ ४६ ॥ अन्यच्च,— स मूर्खः कालमप्राप्य योऽपकर्तरि वर्तते । कलिर्बलवता सार्धं कीटपक्षोद्यमो यथा ॥ ४७ ॥ और जो अवसरके बिना पाये शत्रुसे भिड़ जाता है वह मूर्ख है, और बलवान् के साथ कलह करना चेंटीके पक्ष निकलनेके समान है ॥ ४७ ॥ किंच,— कौर्मं संकोचमास्थाय प्रहारमपि मर्षयेत् । प्राप्तकाले तु नीतिज्ञ उत्तिष्ठेत्क्रूरसर्पवत् ॥ ४८ ॥ और नीति जानने वाला कछुएके मुख सिकोड़नेके समान प्रहारको भी सहे और अवसर मिलने पर क्रूर सर्पके समान उठ बैठे ॥ ४८ ॥ महत्यल्पेऽप्युपायज्ञः सममेव भवेत्क्षमः । समुन्मूलयितुं वृक्षांस्तृणानीव नदीरयः ॥ ४९ ॥ उपायका जानने वाला बड़े और छोटे शत्रुके नाश करनेमें समान समर्थ होता है, जैसे नदीका वेग तृण और वृक्षोंको जड़से उखाड़नेको समर्थ होता है ॥४९॥ अतस्तद्दूतोऽप्याश्वास्य तावद्ध्रियतां यावद्दुर्गः सज्जीक्रियते । इसलिये उसके दूतको विश्वास दिला कर तब तक रुकवा लीजिये कि जब तक गढ़ सज जाय; हि० १२
१७८ हितोपदेशः [विग्रहः ५०- यतः,— एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः। शतं शतसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विशिष्यते ॥ ५० ॥ क्योंकि—किले पर बैठा हुआ एक धनुषधारी सैकड़ों मनुष्योंसे युद्ध कर सकता है, और सैंकड़ों मनुष्य एक लाख मनुष्योंसे लड़ाईमें भिड़ सकते हैं, इसलिये गढ़ अधिक है अर्थात् युद्धमें वह एक बलवत्तर साधन माना गया है ॥ ५० ॥ किंच,— अदु र्गो विषयः कस्य नारेः परिभवास्पदम् । अदुर्गोऽनाश्रयो राजा पोतच्युतमनुष्यवत् ॥ ५१ ॥ और गढ़से रहित राजा किस शत्रुके पराजयका विषय नहीं होता है ? अर्थात् बिना गढ़के एवं आश्रयशून्य राजा सहजहीमें जीता जा सकता है, इसलिये गढ़ बिना आश्रयहीन राजा नावसे (जलमें) गिरे हुए निराधार पुरुषके समान है ॥ दुर्गं कुर्यान्महाखातमुच्चप्राकारसंयुतम् । सयंत्रं सजलं शैलसरिन्मरुवनाश्रयम् ॥ ५२ ॥ पहाड़, नदी, निर्जलदेश और गहरे वनके पास बड़ी गहरी खाई तथा ऊँचे परकोटेसे युक्त और तोप-गोले तथा बारूद और जल इनसे युक्त किला बनाना चाहिये ॥ ५२ ॥ विस्तीर्णताऽतिवैषम्यं रसधान्येध्मसंग्रहः । प्रवेशश्चापसारश्च सप्तैता दुर्गसंपदः' ॥ ५३ ॥ लंबा, चौड़ा, ऊँचा, नीचा, जल, अन्न और ईंधन इनका संग्रह, और जाने तथा आनेका मार्ग, ये गढ़की सात प्रधान सामग्रियाँ हैं ॥ ५३ ॥ राजाह—'दुर्गानुसंधाने को नियुज्यताम् ?' । राजा बोला—'गढ़ बनानेमें किसे नियुक्त करना चाहिये ?' चक्रो ब्रूते— 'यो यत्र कुशलः कार्ये तं तत्र विनियोजयेत् । कर्मस्वदृष्टकर्मा यः शास्त्रज्ञोऽपि विमुह्यति ॥ ५४ ॥ चकवा बोला—'जो जिस काममें चतुर हो उसको उस काममें नियत कर देना चाहिये, क्योंकि जिसको कामका अनुभव नहीं है ऐसा बुद्धिमान् होता हुआ भी (समयपर) गड़बड़ा जाता है ॥ ५४ ॥
-५६] भेदी कौएका राजाके पास आना १७९ तदाहूयतां सारसः ।' तथानुष्ठिते सत्यागतं सारसमालोक्य राजोवाच—'भोः सारस ! त्वं सत्वरं दुर्गमनुसंधेहि ।' सारसः प्रणम्योवाच—'देव ! दुर्गे तावदिदमेव चिरात्सुनिरूपितमास्ते महत्सरः । किंत्वत्र मध्यवर्तिद्वीपे द्रव्यसंग्रहः क्रियताम् । इसलिये सारसको बुलाओ ।' ऐसा करने पर सारसको आया देख राजा बोला—'सारस ! तू शीघ्र गढ़को बना ।' सारसने प्रणाम करके कहा—'महाराज ! गढ़ तो बहुत कालसे देखाभाला यही बड़ा सरोवर ठीक है । परन्तु इस बीचके द्वीपमें सामग्री इकट्ठी कर दी जावे; यतः,— धान्यानां संग्रहो राजन्नुत्तमः सर्वसंग्रहात् । निक्षिप्तं हि मुखे रत्नं न कुर्यात्प्राणधारणम् ॥ ५५ ॥ क्योंकि—हे राजा ! सब तरहके संग्रहसे अन्नका संग्रह श्रेष्ठ है, क्योंकि मुखमें रक्खा हुआ रत्न अर्थात् धन प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता है ॥ ५५ ॥ किंच,— ख्यातः सर्वरसानां हि लवणो रस उत्तमः । गृहीतं च विना तेन व्यञ्जनं गोमयायते ॥ ५६ ॥ और—सब रसोंमें प्रसिद्ध नोन रस सचमुच उत्तम है कि जिसके विना ग्रहण ( भक्षण ) भोजनका किया हुआ पदार्थ गोबर-सा (स्वादरहित) लगता है ॥ ५६ ॥ राजाह—'सत्वरं गत्वा सर्वमनुतिष्ठ ।' पुनः प्रविश्य प्रतीहारो ब्रूते—'देव ! सिंहलद्वीपादागतो मेघवर्णो नाम वायसः सपरिवारो द्वारि तिष्ठति । देवपादं द्रष्टुमिच्छति ।' राजाह—'काकाः पुनः सर्वज्ञा बहुद्रष्टारश्च । तद्भवति संग्राह्य इत्यनुवर्तते ।' चक्रो ब्रूते— 'देव ! अस्त्येवम् । किंतु काकः स्थलचरः । तेनास्मद्विपक्षे नियुक्तः कथं संग्राह्यः ? राजा बोला—'शीघ्र जा कर सब तयारी कर ।' फिर द्वारपाल आ कर बोला— 'महाराज ! सिंहलद्वीपसे आया हुआ मेघवर्ण नाम कौवा कुटुम्बसमेत द्वार पर बैठा है । महाराजका दर्शन करना चाहता है ।' राजा बोला—'क्या कहना है ! काक तो सब जानने वाले और ऊँच नीच विचार कर काम करने वाले होते हैं । इसलिये उनको ( अपने पक्षमें ) रखना ऐसा ( ठीक ) जान पड़ता है ।' चक्रवा
१८० हितोपदेशः [ विग्रहः ५७-
बोला-'महाराज ! यह ठीक है । परन्तु कौवा पृथ्वी पर घूमने वाला है। इसलिये हमारे शत्रुपक्षमें मिला हुआ है, और कैसे ( अपने पक्षमें ) रखने योग्य होगा ? तथा चोक्तम्,— आत्मपक्षं परित्यज्य परपक्षेषु यो रतः । स परैर्हन्यते मूढो नीलवर्णशृगालवत् ॥ ५७ ॥ जैसा कहा है—जो अपने साथियोंको छोड़ कर शत्रुके पक्ष पर स्नेह करता है वह मूर्ख नीलवर्ण सियारके समान शत्रुओंसे मारा जाता है' ॥ ५७ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला-'यह कहानी कैसी है?' मंत्री कहने लगा ।— कथा ८ [ नीलमें रंगे हुए एक गीदड़की मृत्युकी कहानी ८ ] 'अस्त्यरण्ये कश्चिच्छृगालः स्वेच्छया नगरोपान्ते भ्राम्य- न्नीलीभाण्डे पतितः । पश्चात्तत उत्थातुमसमर्थः प्रातरात्मानं मृतवत्संदर्श्य स्थितः । अथ नीलीभाण्डस्वामिना मृत इति ज्ञात्वा तस्मात्समुत्थाप्य दूरे नीत्वापसारितस्तत्सात्पलायितः । ततोऽसौ वनं गत्वा स्वकीयमात्मानं नीलवर्णमवलोक्याचि- न्तयत्—'अहमिदानीमुत्तमवर्णः। तदाऽहं स्वकीयोत्कर्षं किं न साधयामि ?' इत्यालोच्य शृगालानाहूय तेनोक्तम्—'अहं भग- वत्या वनदेवतया स्वहस्तेनारण्यराज्ये सर्वोषधिरसेनाभिषिक्तः । तदद्यारभ्यारण्येऽस्मदाज्ञया व्यवहारः कार्यः ।' शृगालाश्च तं विशिष्टवर्णमवलोक्य साष्टाङ्गपातं प्रणम्योचुः—'यथाज्ञा- पयति देवः ।' इत्यनेनैव क्रमेण सर्वेष्वरण्यवासिष्वाधिपत्यं तस्य बभूव । ततस्तेन स्वज्ञातिभिरावृतेनाधिक्यं साधितम् । ततस्तेन व्याघ्रसिंहादीनुत्तमपरिजनान्प्राप्य सदसि शृगाला- नवलोक्य लज्जमानेनावज्ञया स्वज्ञातयः सर्वे दूरीकृताः । ततो विषण्णाञ्शृगालानवलोक्य केनचिद्वृद्धशृगालेनैतत्प्रतिज्ञातम्— 'मा विषीदत । यदनेनानभिज्ञेन नीतिविदो मर्मज्ञा वयं स्वसमी- पात्परिभूतास्तद्यथाऽयं नश्यति तथा विधेयम् । यतोऽमी व्याघ्रा- दयो वर्णमात्रविप्रलब्धाः शृगालमज्ञात्वा राजानमिमं मन्यन्ते ।