हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context०८ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ३३- और जैसे एक पहियेसे रथ नहीं चलता है वैसेही उद्योगके विना प्रारब्ध नहीं खुलती है ॥ ३२ ॥ तथा च,― पूर्वजन्मकृतं कर्म तद्दैवमिति कथ्यते । तस्मात्पुरुषकारेण यत्नं कुर्यादतन्द्रितः ॥ ३३ ॥ और पूर्व जन्ममें कियेहुए कामहीको प्रारब्ध कहते हैं, इसलिये मनुष्यको आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ करना चाहिये ॥ ३३ ॥ यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति । एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥ जैसे कुम्हार मट्टीके लोंदेसे जो चाहता है सो बनाता है, उसी तरह मनुष्य भी अपना किया हुआ कर्म पाता है ॥ ३४ ॥ काकतालीयवत् प्राप्तं दृष्ट्वापि निधिमग्रतः । न स्वयं दैवमादत्ते पुरुषार्थमपेक्षते ॥ ३५ ॥ काकतालीय न्यायके समान अर्थात् अनायास इकट्ठे धनको सामने देखकर भी स्वयं भाग्य ग्रहण नहीं करता है, किंतु कुछ पुरुषार्थकी अपेक्षा होती है ॥३५॥ उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ ३६ ॥ उद्योगसे कार्य सिद्ध होते हैं, मनोरथोंसे नहीं, जैसे सोते हुए सिंहके मुखमें मृग अपने आप नहीं घुसते हैं ॥ ३६ ॥ मातृपितृकृताभ्यासो गुणितामेति बालकः । न गर्भच्युतिमात्रेण पुत्रो भवति पण्डितः ॥ ३७ ॥ माता-पितासे अभ्यास कराया गया बालक गुणवान् होता है, गर्भसे निकलतेही पुत्र पण्डित नहीं होता ॥ ३७ ॥ माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः । न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥ ३८ ॥ जिन माता-पिताने अपने बालकको नहीं पढ़ाया है, वे उसके वैरी हैं और वह बालक सभामें, हंसोंमें बगुलेकी तरह शोभा नहीं देता है ॥ ३८ ॥