हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-४२ ] सुदर्शनराजाको विष्णुशर्माका आश्वासन ९ रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसंभवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ ३९ ॥ सौन्दर्य तथा यौवनसे युक्त और बड़े कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य विद्याहीन होनेसे सुगन्धरहित टेसूके पुष्पोंके समान शोभा नहीं पाते हैं ॥ ३९ ॥ मूर्खोऽपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टितः । तावच्च शोभते मूर्खो यावत्किञ्चिन्न भाषते' ॥ ४० ॥ सुन्दर कपड़े पहिना हुआ मूर्ख भी सभामें तभीतक अच्छा लगता है कि जबतक वह कुछ न बोले' ॥ ४० ॥ एतच्चिन्तयित्वा स राजा पण्डितसभां कारितवान् । राजो- वाच—'भो भोः पण्डिताः ! श्रूयताम् । अस्ति कश्चिदेवंभूतो विद्वान् यो मम पुत्राणां नित्यमुन्मार्गगामिनामनधिगतशास्त्राणामिदानीं नीतिशास्त्रोपदेशेन पुनर्जन्म कारयितुं समर्थः ? यह सोच विचार कर उस राजाने पण्डितोंकी सभा कराई; (और) राजा बोला-'हे पण्डितमहाशयो ! सुनिये. (इस सभामें) कोई ऐसाभी पण्डित है जो मेरे नित्य कुमार्गी तथा शास्त्रको नहीं पढ़े हुए बेटोंका अब नीतिशास्त्रके उपदेशसे नया जन्म करानेको समर्थ हो ? यतः,— काचः काञ्चनसंसर्गाद्धत्ते मारकतीं द्युतिम् । तथा सत्संनिधानेन मूर्खो याति प्रवीणताम् ॥ ४१ ॥ क्योंकि—सुवर्णके संग होनेसे जैसे कांचकी मरकतमणिकी-सी शोभा हो जाती है, वैसेही अच्छे संगसे मूर्खभी चतुर हो जाता है ॥ ४१ ॥ उक्तं च,— हीयते हि मतिस्तात ! हीनैः सह समागमात् । समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम्' ॥ ४२ ॥ और कहा है कि-नीचोंके साथ रहनेसे बुद्धि घट जाती है, समान पुरुषोंके साथ रहनेसे समान रहती है और अधिक बुद्धिमानोंके साथ रहनेसे बढ़ जाती है' ४२ अत्रान्तरे विष्णुशर्मनामा महापण्डितः सकलनीतिशास्त्र-