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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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१० हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ४३- तत्त्वज्ञो बृहस्पतिरिवाब्रवीत्—'देव ! महाकुलसंभूता एते राजपुत्राः । तन्मया नीतिं ग्राहयितुं शक्यन्ते । उस समय सम्पूर्ण नीतिशास्त्रके सारको जाननेवाले, बृहस्पतिजीके समान एक बड़े धुरंधर पण्डित विष्णुशर्माजी बोले-'महाराज ! ये बड़े सत्कुलमें उत्पन्न हुए राजपुत्र हैं, इसलिये मैं इनको नीति सिखा सकता हूं, क्योंकि,— यतः,— नाद्रव्ये निहिता काचित्क्रिया फलवती भवेत् । न व्यापारशतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः ॥ ४३ ॥ क्योंकि, अयोग्य वस्तुमें किया हुआ परिश्रम सफल नहीं होता है, जैसे अनेक उपाय करने परभी तोतेके समान बगुला नहीं पढ़ाया जा सकता है ॥ ४३ ॥ अन्यच्च,— अस्मिंस्तु निर्गुणं गोत्रे नापत्यमुपजायते । आकरे पद्मरागाणां जन्म काचमणेः कुतः ? ॥ ४४ ॥ और दूसरे—इस राजकुलमें गुणहीन सन्तान उत्पन्न नहीं होसकती है, जैसे पद्मरागमणियोंकी खानमें काचमणिका जन्म कैसा होसकता है ? ॥ ४४ ॥ अतोऽहं षण्मासाभ्यन्तरे तव पुत्रान्नीतिशास्त्राभिज्ञान्करिष्यामि' । राजा सविनयं पुनरुवाच— इसलिये मैं छः महीनोंके भीतर आपके पुत्रोंको नीतिशास्त्रमें निपुण कर दूंगा'. राजा फिर विनयसे बोला,— 'कीटोऽपि सुमनःसङ्गादारोहति सतां शिरः । अश्मापि याति देवत्वं महद्भिः सुप्रतिष्ठितः ॥ ४५ ॥ 'कीड़ाभी पुष्पोंके संगसे सज्जनके शिरपर पहुंच जाता है और बड़े मनुष्योंसे स्थापन किया हुआ पाषाणभी देवता मान कर पूजा जाता है ॥ ४५ ॥ अन्यच्च,— यथोदयगिरेर्द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते । तथा सत्संनिधानेन हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥ ४६ ॥ और दूसरे—जैसे उदयाचलकी वस्तु सूर्यकी किरणोंके गिरनेसे चमकती है उसी तरह सज्जनोंके पास रहनेसे मूर्ख भी शोभायमान लगता है ॥ ४६ ॥