हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-७ ] बूढा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ १५ यतः— अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभां । यत्रास्ते विषसंसर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे ॥ ६ ॥ क्योंकि—दुर्जनसे मनोरथ पूरा भी हो जाय परन्तु परिणाम अच्छा नहीं होता है; जैसे अमृतमें विषके मिलनेसे वह अमृत भी मार डालता है ॥ ६ ॥ किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृत्तिः संदेह एव । परन्तु सर्वदा धनके उत्पन्न करनेमें तो संदेह होताही है । तथा चोक्तम्— न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥ ७ ॥ जैसा कहा है—मनुष्य सन्देहोंमें पडे विना कल्याण नहीं देखता है; परन्तु सन्देहोंमें पड़कर जो जीता रहता है वही देखता है ॥ ७ ॥ तन्निरूपयामि तावत् ।' प्रकाशं ब्रूते—'कुत्र तव कङ्कणम् ?' व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थोऽवदत्—'कथं मारात्मके त्वयि विश्वासः ?'। व्याघ्र उवाच—'शृणु रे पान्थ ! प्रागेव यौवन- दशायामतिदुर्वृत्त आसम् । अनेकगोमानुषाणां वधान्मे पुत्रा मृता दाराश्च । वंशहीनश्चाहम् । ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः— “दानधर्मादिकं चरतु भवान् ।” तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो कथं न विश्वासभूमिः ? इसलिये प्रथम इस बातका निश्चय करूं'. प्रकट बोला—'अरे ! तेरा कंगन कहां है ?' बाघने हाथ पसार कर दिखा दिया. बटोहीने कहा—'मैं तुझ हिंसकमें कैसे विश्वास करूं ?' बाघ बोला—'सुनरे बटोही ! पहले मैं युवावस्थामें बड़ा दुरा- चारी था, अनेक गौओं और मनुष्योंके मारनेसे मेरे स्त्री-पुत्र मर गये. और मैं वंशहीन होगया. तब किसी धर्मात्माने मुझे उपदेश किया कि—“आप दान, धर्म आदि करिये”. उसके उपदेशसे अब मैं स्नान करता हूं, दानी तथा वृद्ध हूं, नख और दांत भी मेरे गल गये हैं, मैं विश्वासके योग्य क्यों नहीं हूं ?