हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context१६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८- यतः,— इज्याऽध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ८ ॥ क्योंकि—यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना, तप करना, सत्य बोलना, धीरज धरना, क्षमाशील होना और लोभ न करना, ये आठ धर्मके मार्ग हैं ॥ ८ ॥ तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥ ९ ॥ इनमेंसे पहले चार तो पाखंड रचनेके ( बाहरी दिखावेके ) लिये भी होते हैं परन्तु पिछले चार केवल महात्मामेंही होते हैं ॥ ९ ॥ मम चैतावांल्लोभविरहो येन स्वहस्तस्थमपि सुवर्णकङ्कणं यस्मै कस्मैचिद्दातुमिच्छामि । तथापि ‘व्याघ्रो मानुषं खादति’ इति लोकप्रवादो दुर्निवारः । मुझे यहां तक लोभ नहीं है कि अपने हाथका कंगनभी किसीको देना चाहता हूं, परन्तु ‘बाघ मनुष्यको खा जाता है’ यह लोकनिन्दा नहीं मिट सकती है। यतः,— गतानुगतिको लोकः कुट्टनीमुपदेशिनीम् । प्रमाणयति नो धर्मे यथा गोघ्नमपि द्विजम् ॥ १० ॥ क्योंकि—अपनी पुरानी लीकपर चलने वाला संसार धर्मके विषयमें कुट्टनीके उपदेशका ऐसा प्रमाण नहीं करता है कि जैसा गो-हिंसक ब्राह्मणका धर्ममें प्रमाण ( विश्वास ) करता है ॥ १० ॥ मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि । शृणु,— और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं, सुन ऐसा कहा है कि— मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः क्षुधार्ते भोजनं तथा । दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दन ! ॥ ११ ॥ हे युधिष्ठिर ! जैसे मारवाड़देशमें वृष्टिका होना और भूखेको भोजन देना लाभदायक है, उसी प्रकार दरिद्रको दान देना लाभदायक होता है ॥ ११ ॥ प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ १२ ॥ जिस प्रकार अपने प्राण प्यारे हैं, वैसेही अन्य प्राणियोंकोभी अपने अपने