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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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-१६ ] मुसाफिरके समक्ष बाघकी निजी क्रिया १७ प्राण प्यारे हैं, इसलिये साधुजन अपने प्राणोंके समान दूसरोंपर भी दया करते हैं ॥ १२ ॥ अपरं च,— प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ १३ ॥ और दूसरी यह बात है-प्रार्थनाका स्वीकार, दान, सुख तथा दुःख, शुभ और अशुभमें, पुरुष अपनी आत्माके समान प्रमाण करता है ॥ १३ ॥ अन्यच्च,— मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥ १४ ॥ और दूसरे—जो पराई स्त्रीको माताके समान, पराये धनको कंकड़के समान, और सब प्राणियोंको अपनी आत्माके समान समझता है, वही सच्चा पण्डित है॥ त्वं चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुभ्यं दातुं सयत्नोऽहम् । तथा चोक्तम्— तू अत्यंत निर्धन है इसलिये मैं तुझे देनेको यत्नशील हूं; जैसा कहा है— दरिद्रान्भर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् । व्याधितस्यौषधं पथ्यं, नीरुजस्य किमौषधैः ? ॥ १५ ॥ हे युधिष्ठिर ! दरिद्रियोंका पालन और पोषण कर तथा धनवानको धन मत दे, क्यों कि, रोगीको औषध गुणदायक होती है और नीरोगको औषधियाँ वृथा हैं ॥ १५ ॥ अन्यच्च,— दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ॥ १६ ॥ और-‘यह देना है’ इस निःस्पृह बुद्धिसे जो दान अनुपकारीको देश काल और सुपात्र विचार कर दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहलाता है ॥ १६ ॥ १ जिसके साथ प्रत्युपकार या कोई अन्य तरह स्वार्थका संबंध न हो ऐसे पुरुषको. हि० २