हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context१८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १७- तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण।' ततो यावदसौ तद्वचः- प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति तावन्महापङ्के निमग्नः पला- यितुमक्षमः । पङ्के पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत्—'अहह, महापङ्के पतितोऽसि । अतस्त्वामहमुत्थापयामि।' इत्युक्त्वा शनैः शनै- रुपगम्य तेन व्याघ्रेण धृतः; स पान्थोऽचिन्तयत्— इसलिये इस सरोवरमें नहाकर सोनेका कंगन ले। तब वह उसकी मीठी २ बातें सुन लोभवश होकर जैसेही सरोवरमें स्नान करनेके लिये उतरा वैसेही घनी कीचड़में फँस गया और भाग न सका। उसको कीचड़में फँसा देखकर व्याघ्रने कहा—'ओहो ! तू बड़ी भारी कीचड़में फँस गया है, इसलिये मैं तुझे बाहर निकालता हूं. यह कह कर और धीरे धीरे पास जाकर उस बाघने उसे पकड़ लिया, तब वह बटोही सोचने लगा— 'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं , न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः । स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः ॥ १७ ॥ 'जो दुष्ट है उसे धर्मशास्त्र और वेद पढ़नेसे क्या होता है ? क्योंकि, स्वभाव ही सबसे प्रबल होता है, जैसे गौका दूध स्वभावसेही मीठा होता है' ॥ १७ ॥ किंच,— अवशेन्द्रियचित्तानां हस्तिस्नानमिव क्रिया । दुर्भागाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना ॥ १८ ॥ और जिनकी इन्द्रियां और चित्त वशमें नहीं है उनका व्यापार हाथीके स्नानके समान निष्फल है, और इसी प्रकार क्रियाके विना ज्ञान, वंध्या स्त्रियोंके पालन-पोषणके समान भार अर्थात् निष्फल है ॥ १८ ॥ १ वस्तुतः 'गजवत् स्नानमाचरेत्' यह उक्ति केवल स्नानकी रीत बता देती है, क्योंकि, हाथी नहानेके बाद तुरंतही शूंड़से अपने शरीरके ऊपर धूल फेंकता है, जिस वजहसे उसका स्नान निष्फलही है. २ विधवा स्त्रियोंके गहने पहननेके समान निष्फल है ऐसा अर्थ भी हो सकता है, अर्थात् जैसा कि संतति उत्पत्तिकी आशा न होनेसे वंध्याका पालन-पोषण भार है वैसेही बिना पतिके विधवाको अलंकार भार है.