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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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६० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १५०- संसारमें प्राणियोंका धर्म क्या है कि जीवों पर दया करना, और सुख क्या है कि नीरोग रहना, स्नेह क्या है कि सत्कारपूर्वक मिलना, और पंडिताई क्या है कि उच्च नीच विचार कर काम करना ॥ १४९ ॥ तथा च,— परिच्छेदो हि पाण्डित्यं यदापन्ना विपत्तयः । अपरिच्छेदकर्तॄणां विपदः स्युः पदे पदे ॥ १५० ॥ और विपत्तियोंके आजाने पर, निर्णय करके काम करनाही चतुराई है, क्योंकि बिना विचारे काम करने वालोंको पद पदमें विपत्तियां हैं ॥ १५० ॥ त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे स्वात्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ १५१ ॥ कुलकी मर्यादाके लिये एकको, गांवभरके लिये कुलको, देशके लिये गांवको और अपने लिये पृथ्वीको छोड़ देना चाहिये ॥ १५१ ॥ अपरं च,— पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः” ॥ १५२ ॥ और दूसरे—अनायास मिला हुआ जल और भयसे मिला मीठा भोजन उन दोनोंमें विचार कर देखता हूं तो जिसमें चित्त बेखटके रहे उसीमें सुख है अर्थात् पराधीन भोजनसे स्वाधीन जलका मिलना उत्तम है ॥ १५२ ॥ इत्यालोच्याहं निर्जनवनमागतः । यह विचार कर मैं निर्जन वनमें आया हूं । यतः,— वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयं पक्वफलाम्बुभोजनम् । तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥ १५३ ॥ क्योंकि—सिंह और हाथियोंसे भरे हुए वनमें वृक्षके नीचे रहना, पके हुए कंद मूल फल खाकर जल पान करना तथा घासके बिछोनेपर सोना और छालके वस्त्र पहनना अच्छा है पर भाई बन्धुओंके बीचमें धनहीन जीना अच्छा नहीं है ॥ १५३ ॥