हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१५७ ] संसारी पुरुषको उचित उपदेश ६१ ततोऽस्मत्पुण्योदयादनेन मित्रेणाहं स्नेहानुवृत्त्यानुगृहीतः। अधुना च पुण्यपरम्परया भवदाश्रयः स्वर्ग एव मया प्राप्तः। फिर मेरे पुण्यके उदयसे इस मित्रने परम स्नेहसे मेरा आदर किया और अब पुण्यकी रीतिसे तुम्हारा आश्रय मुझे स्वर्गके समान मिल गया. यतः,— संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले । काव्यामृतरसास्वादः संगमः सुजनैः सह' ॥ १५४ ॥ क्योंकि—संसाररूपी विषवृक्षके दो ही रसीले फल हैं; अर्थात् एक तो काव्यरूपी अमृतके रसका स्वाद और दूसरा सज्जनोंका संग' ॥ १५४ ॥ मन्थर उवाच— 'अर्थाः पादरजोपमा गिरिनदीवेगोपमं यौवन- मायूष्यं जललोलबिन्दुचपलं फेनोपमं जीवितम् । धर्मं यो न करोति निन्दितमतिः स्वर्गार्गलोद्घाटनं पश्चात्तापयुतो जरापरिगतः शोकाग्निना दह्यते ॥ १५५ ॥ मंथर बोला—'धन तो चरणोंकी धूलिके समान है, यौवन पहाड़ की नदीके वेगके समान है, आयु चंचल जलकी बिन्दुके समान चपल है और जीवन फेन ( झाग ) के समान है, इसलिये जो निर्बुद्धि स्वर्गकी आगलको खोलने वाले धर्मको नहीं करता है वह पीछे बुढ़ापेमें पछता कर शोककी अग्निसे जलाया जाता है ॥ १५५ ॥ युष्माभिरतिसंचयः कृतः । तस्यायं दोषः; शृणु,— तुमने बहुतसा संचय किया था उसका यह दोष है ॥ सुनो,— उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १५६ ॥ गंभीर सरोवरमें भरे हुए जलके चारों ओर निकलनेके (वारंवार जल निकाल देना जैसा सरोवरकी शुद्धिका कारण है, उसीके ) समान कमाये हुए धनका सत्पात्रमें दान करना ही रक्षा है ॥ १५६ ॥ अन्यच्च,— यदधोऽधः क्षितौ वित्तं निचखान मितंपचः । तदधोनिलयं गन्तुं चक्रे पन्थानमग्रतः ॥ १५७ ॥