BharatKosha
Back to the archive

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages
Page 238Permalink

२१८ हितोपदेशः [ संधिः ७- 'स्वामी ! इस सेवकको बड़ा सुख है, क्योंकि यह चोरी करके कपूर खाया करता है, यह मैंने इसका मुख सूँघ कर जान लिया।' जैसा कहा है-'स्त्रियोंका भोजन दूनो होता है' इत्यादि।' यह सुन कर सेवकने क्रोध कर कहा-'हे स्वामी ! जिस स्वामीकी ऐसी स्त्री है वहाँ सेवक कैसे टिक सकता है कि जहाँ क्षणक्षणमें घरवाली सेवकका मुख सूँघती है?' फिर वह उठ कर जाने लगा, तब बनियेने बड़ी कोशिशसे समझा कर रख उसे लिया । इसलिये मैं कहता हूँ-"आपत्तिके उत्पन्न होने पर" आदि ।' ततो यद्भविष्येणोक्तम्,— 'यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ?' ॥ ७ ॥ फिर यद्भाविष्यने कहा-'जो होनहार नहीं है वह कभी नहीं होगा, और जो होनहार है उससे उलटा कभी न होगा अर्थात् होनहार अवश्य होगा यह चिंतारूपी विषका नाश करने वाली औषध क्यों नहीं पीते हो ?' ॥ ७ ॥ ततः प्रातर्जालेन बद्धः प्रत्युत्पन्नमतिर्मृतवदात्मानं संदर्श्य स्थितः । ततो जालादपसारितो यथाशक्त्युत्प्लुत्य गभीरं नीरं प्रविष्टः । यद्भाविष्यश्च धीवरैः प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि-"अनागतविधाता" इत्यादि ॥ तद्यथाहमन्यह्रदं प्राप्नोमि तथा क्रियताम् ।' हंसावाहतुः—'जलाशयान्तरे प्राप्ते तव कुशलम्, स्थले गच्छतस्ते को विधिः ?' कूर्म आह—'यथाऽहं भवद्भ्यां सहाकाशवर्त्मना यामि तथा विधीयताम् ।' हंसौ ब्रूतः—'कथमुपायः संभवति ?' । कच्छपो वदति—'युवाभ्यां चञ्चुधृतं काष्ठखण्डमेकं मया मुखेनावलम्ब्य गन्तव्यम् । युवयोः पक्षबलेन मयाऽपि सुखेन गन्तव्यम् ।' फिर प्रातःकाल जालसे बँध कर प्रत्युत्पन्नमति अपनेको मरेके समान दिखला कर बैठा रहा । फिर जालसे बाहर निकाला हुआ अपनी शक्तिके अनुसार उछल कर गहरे पानीमें घुस गया और यद्भविष्यको धीवरोंने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ, “अनागतविधाता” इत्यादि—॥ सो जिस प्रकार मैं दूसरे सरोवरको पहुँच जाऊँ वैसे करो।' दोनों हंस बोले-'दूसरे सरोवरके १ सुहृद्भेदका ११९ वाँ श्लोक देखो ।

Page 239Permalink

-८ ] उपायके साथ अपायका चिन्तन २१९ जानेमें तुम्हारी कुशल है । परंतु पटपड़में तुम्हारे जानेका कौनसा उपाय है ?' कछुआ बोला- 'जिस प्रकार मैं तुम्हारे साथ आकाशमार्गसे जाऊँ वैसा करो ।' हंसोंने कहा-'उपाय कैसे हो सकता है ?' कछुयेने कहा- 'तुम दोनों एक काठके टुकड़ेको चोंचसे पकड़ लो और मैं मुखसे पकड़ कर चलूंगा और तुम्हारे पंखोंके बलसे मैं सुखसे पहुँच भी जाऊँगा ।' हंसौ ब्रूतः- 'संभवत्येष उपायः; किंतु,- हंस बोले-'यह उपाय तो हो सकता है; परंतु,- उपायं चिन्तयन् प्राज्ञो ह्यपायमपि चिन्तयेत् । पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलैर्भक्षिताः प्रजाः' ॥ ८ ॥ पण्डितको उपाय सोचना चाहिये साथ साथ और विपत्तिका भी विचार करना चाहिये । जैसे मूर्ख बगुलेके देखते देखते नेवले सब बच्चे खा गये' ॥ ८ ॥ कूर्मः पृच्छति-'कथमेतत् ?' । तौ कथयतः- कछुआ पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वे दोनों कहने लगे ।- कथा ५ [ बगुले, साँप और नेवलेकी कहानी ५ ] 'अस्त्युत्तरापथे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान्पिप्पलवृक्षः । तत्रा- नैकबका निवसन्ति । तस्य वृक्षस्याधस्ताद्विवरे सर्पो बालाप- त्यानि खादति । अथ शोकार्तानां बकानां विलापं श्रुत्वा केनचि- द्वृद्धेनाभिहितम्- 'एवं कुरुत । यूयं मत्स्यानुपादाय नकुलवि- वरादारभ्य सर्पविवरं यावत्पङ्किक्रमेण विकिरत । ततस्तदाहार- लुब्धैर्नकुलैरागत्य सर्पो द्रष्टव्यः स्वभावद्वेषाद्व्यापादयितव्यश्च ।' तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । ततस्तत्र वृक्षे नकुलैर्बकशावकरावः श्रुतः । पश्चात्तैर्वृक्षमारुह्य बकशावकाः खादिताः । अत आवां ब्रूवः- “उपायं चिन्तयन्” इत्यादि ॥ आवाभ्यां नीयमानं त्वामवलोक्य लोकैः किंचिद्वक्तव्यमेव । तदाकर्ण्य यदि त्वमुत्तरं दास्यसि तदा त्वन्मरणम् । तत्सर्वथाऽत्रैव स्थीयताम् ।' कूर्मो वदति-'किमहम- प्राज्ञः ? नाहमुत्तरं दास्यामि किमपि न वक्तव्यम् । तथानुष्ठिते तथाविधं कूर्ममालोक्य सर्वे गोरक्षकाः पश्चाद्धावन्ति वदन्ति च।

Page 240Permalink

२२० | हितोपदेशः | [ संधिः ८- कश्चिद्वदति—'यद्ययं कूर्मः पतति तदाऽत्रैव पक्त्वा खादितव्यः।' कश्चिद्वदति—'अत्रैव दग्ध्वा खादितव्योऽयम्।' कश्चिद्वदति— 'गृहं नीत्वा भक्षणीयः' इति। तद्वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो विस्मृतपूर्वसंस्कारः प्राह—'युष्माभिर्भस्म भक्षितव्यम्।' इति वदन्नेव पतितस्तैर्व्यापादितश्च। अतोऽहं ब्रवीमि—"सुहृदां हितकामानाम्" इत्यादि॥' अथ प्रणिधिर्बकस्तत्रागत्योवाच— 'देव! प्रागेव मया निगदितम्। दुर्गशोधनं हि प्रतिक्षणं कर्तव्य- मिति। तच्च युष्माभिर्न कृतं तदनवधानस्य फलमनुभूतम्। दुर्गदाहो मेघवर्णेन वायसेन गृध्रप्रयुक्तेन कृतः।' 'उत्तर दिशामें गृध्रकूटक नाम पर्वत पर एक बड़ा पीपलका पेड़ है। उस पर बहुतसे बगले रहते थे। उस वृक्षके नीचे बिलमें एक साँप बगुलोंके छोटे छोटे बच्चोंको खा लिया करता था। फिर शोकसे व्याकुल बगुलोंके विलापको सुन कर किसी बगुलेने कहा—'ऐसा करो। तुम मछलियोंको ले कर नेवलेके बिलसे साँपके बिले तक लगातार फैला दो। फिर उनको खानेके लोभी नेवले वहाँ आ कर साँपको देखेंगे और अपने स्वभावके वैरसे उसे मार डालेंगे। ऐसा करने पर वैसा ही हुआ। पीछे उस वृक्षके ऊपर नेवलोंने बगुलोंके बच्चोंका चहचहाट सुना। फिर उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर बगुलोंके बच्चे खा लिये। इसलिये हम दोनों कहते हैं कि "उपायको सोचना चाहिये" इत्यादि। और हम दोनोंसे ले जाते हुए तुमको देख कर लोग कुछ कहेंगेही। वह सुन कर जो तुम उत्तर दोगे तो तुम मरोगे। इस- लिये चाहे जो कुछ भी हो, पर यहाँ ही रहो।' कछुआ बोला-'क्या मैं मूर्ख हूँ? मैं उत्तर नहीं दूँगा। कुछ न बोलूँगा। और वैसा करने पर कछुएको वैसा देख कर सब ग्वाले पीछे दौड़े और कहने लगेः कोई कहता था-जो यह कछुआ गिर पड़े तो यहाँ ही पका कर खा लेना चाहिये। कोई कहता था—यहाँ ही इसे भून कर खा लें। कोई कहता था कि घर ले चल कर खाना चाहिये। उन सभीका वचन सुन कर वह कछुआ क्रोधयुक्त हो कर पहले उपदेशको भूल कर बोला— 'तुम सभीको धूल फाँकनी चाहिये।' यह कहतेही गिर पड़ा और उन्होंने मार डाला। इसलिये मैं कहता हूँ—"हितकारी मित्रोंका" इत्यादि।' फिर दूत बगुला वहाँ आ कर बोला-'हे महाराज! मैंने तो पहले ही जता दिया था कि गढ़का

Page 241Permalink

-१० ] चित्रवर्ण की मनमोहक बातें करना २२१ संशोधन क्षणक्षणमें अवश्य करना चाहिये। और वह आपने नहीं किया इसलिये उस भूलका फल भुगता । गिद्धके सिखाये भलाये मेघवर्ण कौएने दुर्ग जला दिया। राजा निःश्वस्याह, — 'प्रणयादुपकाराद्वा यो विश्वसिति शत्रुषु । स सुप्त इव वृक्षाग्रात् पतितः प्रतिबुध्यते' ॥ ९ ॥ राजाने साँस भर कर कहा—'जो मनुष्य स्नेहसे अथवा उपकारसे शत्रुओं पर विश्वास करता है वह सोये हुएके समान वृक्षकी फुनगीसे गिर कर जाग पड़ता है, अर्थात् आपत्तिमें पड़ कर उसे जानता हैं' ॥ ९ ॥ प्रणिधिरुवाच— 'इतो दुर्गदाहं विधाय यदा गतो मेघवर्णस्तदा चित्रवर्णेन प्रसादितेनोक्तम्— 'अयं मेघवर्णोऽत्र कर्पूरद्वीपराज्ये- ऽभिषिच्यताम् । दूत बोला—'यहाँसे गढ़का दाह करके जब मेघवर्ण गया तब चित्रवर्णने प्रसन्न हो कर कहा—'इस मेघवर्णको इस कर्पूरद्वीपके राज्य पर राजतिलक कर दो । तथा चोक्तम्,— कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत्। फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत्' ॥ १० ॥ जैसा कहा है— जिस सेवकने कार्य सिद्ध किया है उसके किये हुए कृत्यको कभी निष्फल नहीं करना चाहिये; वरना पारितोषिकसे, मनसे, वचनसे और दृष्टिसे, उसको प्रसन्न करना चाहिये' ॥ १० ॥ चक्रवाको ब्रूते —'ततस्ततः ?।' प्रणिधिरुवाच —'ततः प्रधान- मन्त्रिणा गृध्रेणाभिहितम्— 'देव ! नेदमुचितम् । प्रसादान्तरं किमपि क्रियताम् । चकवा पूछने लगा—'उसके पीछे फिर क्या हुआ ?' दूत बोला- 'पीछे प्रधान मंत्री गिद्धने कहा— 'महाराज ! यह बात उचित नहीं है, कुछ दूसरे भी प्रसाद कीजिये;

Page 242Permalink

यतः,— अविचारयतो युक्तिकथनं तुषखण्डनम् । नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मुद्रितम् ॥ ११ ॥ क्योंकि—हे राजन् ! पूर्वापरको नहीं विचारने वालेको उपाय बतलाना भुसीके पीसनेके समान बेखारथ है और नीचोंमें उपकार करना धुलिमें चिह्न करनेके समान है, अर्थात् जैसा धुलिका चिह्न थोड़ीसी देरमें मिट जाता है वैसा नीचोंमें किया हुआ उपकार और अविचारी पुरुषोंमें उपदेश किया हुआ नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ महतामास्पदे नीचः कदापि न कर्तव्यः । ऊँचे ओहदे पर नीचकी नियुक्ति कभी नहीं करनी चाहिये । जैसा कहा है— तथा चोक्तम्,— नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति । मूषिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा १॥ १२ ॥ नीच अच्छे पदको पा कर स्वामीको मारना चाहता है, जैसे चूहा व्याघ्रत्वको पा कर मुनिको मारने चला' ॥ १२ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— कथा ६ [ महातप नामक संन्यासी और एक चूहेकी कहानी ६ ] 'अस्ति गौतमस्य महर्षेस्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तत्र तेन मुनिना काकेन नीयमानो मूषिकशावको दृष्टः । ततः स्वभावदयात्मना तेन मुनिना नीवारकणैः संवर्धितः । ततो बिडालस्तं मूषिकं खादितुमुपधावति । तमवलोक्य मूषिकस्तस्य मुनेः क्रोडे प्रविवेश । ततो मुनिनोक्तम्—'मूषिक ! त्वं मार्जारो भव ।' ततः स बिडालः कुक्कुरं दृष्ट्वा पलायते । ततो मुनिनोक्तम्—'कुक्कुराद्विभेषि ? । त्वमेव कुक्कुरो भव ।' स च कुक्कुरो व्याघ्राद्विभेति । ततस्तेन मुनिना कुक्कुरो व्याघ्रः कृतः । १ 'नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मूत्रितम्' यह भी पाठ प्रचलित है, जिसका अर्थ—नीच पुरुषमें उपकार करना तो सचमुच धूलि(रेत)में मूतने के समान है'

Page 243Permalink
  • १३ ] नीच की बड़े पदपर हानिदायिता २२३

अथ तं व्याघ्रं मुनिर्मूषिकोऽयमिति पश्यति । अथ तं मुनिं दृष्ट्वा व्याघ्रं च सर्वे वदन्ति—'अनेन मुनिना मूषिको व्याघ्रतां नीतः।' एतच्छ्रुत्वा स व्याघ्रोऽचिन्तयत्—'यावदनेन मुनिना स्थीयते तावदिदं मे रूपाख्यानमकीर्तिकरं न पलायिष्यते' इत्यालोच्य मूषिकस्तं मुनिं हन्तुं गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वा 'पुनर्मूषिको भव' इत्युक्त्वा मूषिक एव कृतः । अतोऽहं ब्रवीमि—“नीचः श्लाघ्यपदं” इत्यादि ॥ 'गौतम महर्षिके तपोवनमें महातपा नाम एक मुनि था । वहाँ उस मुनिने कौएसे लाये हुए एक चूहेके बच्चेको देखा । फिर स्वभावसे दयामय उस मुनिने तृणके धान्यसे उसको बड़ा किया । फिर बिलाव उस चूहेको खानेको दौड़ा । उसे देख कर चूहा उस मुनिकी गोदमें चला गया । फिर मुनिने कहा कि-‘हे चूहे ! तू बिलाव हो जा ।' फिर वह बिलाव कुत्तेको देख कर भागने लगा । फिर मुनिने कहा-‘तू कुत्तेसे डरता है ? जा तू भी कुत्ता हो जा।' बाद वह कुत्ता बाघसे डरने लगा । फिर उस मुनिने उस कुत्तेको बाघ कर दिया । वह मुनि, उस बाघको “यह तो चूहा है” ऐसे (उसे असली स्वरूपसे) देखता था । उस मुनिको और व्याघ्रको देख कर सब लोग कहा करते थे कि “इस मुनिने इस चूहेको बाघ बना दिया है ।” यह सुन कर वह बाघ सोचने लगा-‘जब तक यह मुनि जिंदा रहेगा तब तक यह मेरा अपयश करने वाले स्वरूपकी कहानी नहीं मिटेगी ।' यह विचार कर चूहा उस मुनिको मारनेके लिये चला । फिर मुनिने यह जान कर “फिर चूहा हो जा” यह कह कर चूहाही कर दिया । इसलिये मैं कहता हूँ—“नीच ऊँचा पद पर” इत्यादि; अपरं च, सुकरमिदमिति न मन्तव्यम् । शृणु,— और दूसरे-यह बात सुलभ है ऐसा नहीं जानना चाहिये । सुनिये,— भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमाधममध्यमान् । अतिलोभाद्वकः पश्चान्मृतः कर्कटकग्रहात्' ॥ १३ ॥ एक बगुला बहुतसे बड़े छोटे, और मध्यम मच्छोंको खा कर अधिक लोभसे कर्कटके पकड़नेसे मारा गया' ॥ १३ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा।—

कथा ७

Page 244Permalink

२२४ हितोपदेशः [ संधिः १४- कथा ७ [ बूढे बगुले, केंकडे और मछलीकी कहानी ७ ] 'अस्ति मालवदेशे पद्मगर्भनामधेयं सरः। तत्रैको वृद्धो बकः सामर्थ्यहीन उद्विग्नमिवात्मानं दर्शयित्वा स्थितः। स च केनचि- त्कुलीरेण दृष्टः पृष्टश्च—'किमिति भवानत्राहारत्यागेन तिष्ठति ?' बकेनोक्तम्-‘मत्स्या मम जीवनहेतवः ते कैवर्तैरागत्य व्यापादयि- तव्या इति वार्ता नगरोपान्ते मया श्रुता। अतो वर्तनाभावादे- वास्मन्मरणमुपस्थितमिति ज्ञात्वाऽऽहारेऽप्यनादरः कृतः ।' ततो मत्स्यैरालोचितम्—'इह समये तावदुपकारक एवायं लक्ष्यते । तदयमेव यथाकर्तव्यं पृच्छ्यताम् । 'मालव देशमें पद्मगर्भ नाम एक सरोवर है। वहाँ एक बूढ़ा बगुला सामर्थ्य- रहित सोचमें डूबे हुएके समान अपना स्वरूप बनाये बैठा था। तब किसी कर्कटने उसे देखा और पूछा—'यह क्या बात है ? तुम भूखे प्यासे यहाँ बैठे हो ?' बगु- लेने कहा—'मच्छ मेरे जीवनमूल हैं। उन्हें धीवर आ कर मारेंगे यह बात मैंने नगरके पास सुनी है। इसलिये जीविकाके न रहनेसे मेरा मरणही आ पहुँचा, यह जान कर मैंने भोजनमें भी अनादर कर रक्खा है।' फिर मच्छोंने सोचा-'इस समय तो यह उपकार करने वाला ही दीखता है इसलिये इसीसे जो कुछ करना है सो पूछना चाहिये । तथा चोक्तम्,— उपकर्त्राऽरिणा संधिर्न मित्रेणापकारिणा । उपकारापकारौ हि लक्ष्यं लक्षणमेतयोः' ॥ १४ ॥ जैसा कहा है कि—उपकारी शत्रुके साथ मेल करना चाहिये और अपकारी मित्रके साथ नहीं करना चाहिये, क्योंकि निश्चय करके उपकार और अपकार ही मित्र और शत्रुके लक्षण हैं ॥ १४ ॥ मत्स्या ऊचुः-‘भो बक ! कोऽत्र रक्षणोपायः ?' । बको ब्रूते— 'अस्ति रक्षणोपायो जलाशयान्तराश्रयणम् । तत्राहमेकैकशो युष्मान्नयामि।' मत्स्या आहुः—'एवमस्तु ।' ततोऽसौ बकस्तान्म- त्यानेकैकशो नीत्वा खादति ।' अनन्तरं कुलीरस्तमुवाच—'भो बक ! मामपि तत्र नय ।' ततो बकोऽप्यपूर्वकुलीरमांसार्थी

तत्स्थलमालोक्याचिन्तयत्—'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु,

Page 245Permalink

-१५] मनोरूपराज्यमें आनंद माननेवालेकी निंदा २२५ सादरं तं नीत्वा स्थले धृतवान् । कुलीरोऽपि मत्स्यकण्टकाकीर्णं तत्स्थलमालोक्याचिन्तयत्—'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु, इदानीं समयोचितं व्यवहरिष्यामि' इत्यालोच्य कुलीरस्तस्य ग्रीवां चिच्छेद । स बकः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"भक्ष- यित्वा बहून्मत्स्यान्" इत्यादि ॥' ततश्चित्रवर्णोऽवदत्—'शृणु तावन्मन्त्रिन् ! मयैतदालोचितमस्ति ।' अत्रावस्थितेन मेघवर्णेन राज्ञा यावन्ति वस्तूनि कर्पूरद्वीपस्योत्तमानि तावन्त्यस्माकमुप- नेतव्यानि । तेनास्माभिर्महासुखेन विन्ध्याचले स्थातव्यम् ।' मच्छ बोले—'हे बगुले ! इसमें रक्षाका कौनसा उपाय है ? तब बगुला बोला— दूसरे सरोवरका आश्रय लेना ही रक्षाका उपाय है । वहाँ मैं एक एक करके तुम सबको पहुँचा देता हूँ।' मच्छ बोले—'अच्छा, ले चलो।' पीछे यह बगुला उन मच्छोंको एक एक ले जा कर खाने लगा । इससे पीछे कर्कट उससे बोला—'हे बगुले ! मुझे भी वहाँ ले चल ।' फिर अपूर्व कर्कटके मांसका लोभी बगुलेने आदरसे उसे भी वहाँ ले जा कर पटपड़में धरा । कर्कट भी मच्छोंकी हड्डियोंसे बिछे हुए उस पड़ावको देख कर चिन्ता करने लगा—'हाय मैं मन्दभागी मारा गया । जो कुछ हो, अब समयके अनुसार उचित काम करूँगा।' यह विचार कर कर्कटने उसकी नाइ काट डाली और वह बगुला मर गया । इसलिये मैं कहता हूँ "बहुतसे मच्छोंको खा कर" इत्यादि । फिर चित्रवर्ण बोला—'हे मंत्री ! सुनो, मैंने तो यही सोच रक्खा है । वहाँ बैठा हुआ राजा मेघवर्ण जितनी उत्तम वस्तुएँ कर्पूरद्वीपकी हैं उतनी हमारे पास भेटमें लावेगा । उससे हम विन्ध्याचलमें आनन्दसे रहेंगे ।' दूरदर्शी विहस्याह—'देव ! दूरदर्शी हँस कर बोला—'हे महाराज ! अनागतवतीं चिन्तां कृत्वा यस्तु प्रहृष्यति । स तिरस्कारमाप्नोति भग्नभाण्डो द्विजो यथा' ॥ १५ ॥ जो नहीं आई हुई चिंताको करके प्रसन्न होता है वह मट्टीके बर्तन फोड़ने वाले ब्राह्मणके समान अपमानको पाता है' ॥ १५ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— हि० १५

कथा ८

Page 246Permalink

२२६ हितोपदेशः [ संधिः १५- कथा ८ [ देवशर्मा नामक ब्राह्मण और कुम्हारकी कहानी ८ ] 'अस्ति देवीकोटनाम्नि नगरे देवशर्मा नाम ब्राह्मणः । तेन महा- विषुवसंक्रान्त्यां सक्तुपूर्णशराव एकः प्राप्तः । तमादायासौ कुम्भ- कारस्य भाण्डपूर्णमण्डपैकदेशे रौद्रेणाकुलितः सुप्तः । ततः सक्तु- रक्षार्थं हस्ते दण्डमेकमादायाचिन्तयत्—'यद्यहं सक्तुशरावं विक्रीय दश कपर्दकान् प्राप्स्यामि तदाऽत्रैव तैः कपर्दकैर्घटशरावा- दिकमुपक्रीयानेकधावृद्धैस्तद्धनैः पुनः पुनः पूगवस्त्रादिकमुपक्रीय विक्रीय लक्षसंख्यानि धनानि कृत्वा विवाहचतुष्टयं करिष्यामि । अनन्तरं तासु सपत्नीषु रूपयौवनवती या तस्यामधिकानुरागं करिष्यामि । सपत्न्यो यदा द्वन्द्वं करिष्यन्ति तदा कोपाकुलोऽहं ता लगुडेन ताडयिष्यामि' इत्यभिधाय लगुडः क्षिप्तः । तेन सक्तु- शरावश्चूर्णितो भाण्डानि च बहूनि भग्नानि । ततस्तेन शब्देनाग- तेन कुम्भकारेण तथाविधानि भाण्डान्यवलोक्य ब्राह्मणस्तिरस्कृतो मण्डपाद्बहिःकृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि—"अनागतवतीं चिन्ताम्" इत्यादि ॥' ततो राजा रहसि गृध्रमुवाच—'तात ! यथा कर्तव्यं तथोपदिश ।' 'देवीकोट नाम एक नगरमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था । उसने मेषकी संक्रान्ति पर सत्तूसे भरा एक सकोरा पाया । उसको ला कर वह कुम्हारके बर्त- नोंसे भरे हुए अवेकी एक ओर गरमीके कारण सो गया । फिर सत्तूकी रख- वालीके लिये हाथमें एक लकड़ी ला कर सोचने लगा कि-'जो मैं सत्तूके सकोरे- को बेच कर दस कौड़ी पाऊंगा तो यहाँ ही उन कौड़ियोंसे घड़े, सकोरे आदि मोल ले कर अनेक रीतिसे बढ़ाये हुए उस धनसे बार बार सुपारी कपड़े आदि मोल ले कर और बेच कर लाखों रुपयेका धन इकट्ठा करके चार विवाह करूँगा । फिर उन स्त्रियोंमें जो रूपरंगमें अच्छी होगी उसी पर अधिक स्नेह करूँगा, और सौतें जब लड़ाई करेंगी तब क्रोधसे उखता कर मैं उन्हें लकड़ीसे मारूँगा— यह कह कर लकड़ी फेंकी । उससे सत्तूका सकोरा चूर चूर हो गया और बहुतसे बर्तन भी फूट गये । फिर उस शब्दको सुन कुम्हार आया। उसने वैसे फूटे टूटे बर्तनोंको देख कर ब्राह्मणका तिरस्कार किया और अवेसे बाहर निकाल दिया ! इसलिये मैं कहता हूँ—"विना आई चिंताको" इत्यादि ।' फिर राजा एकांतमें गिद्धसे बोला-'प्यारे ! जो करना हो सो कहो ।

Page 247Permalink

-१८ ] समयानुसार कथन २२७ गृध्रो ब्रूते, — 'मदोद्धतस्य नृपतेः संकीर्णस्येव दन्तिनः । गच्छन्त्युन्मार्गयातस्य नेतारः खलु वाच्यताम् ॥ १६ ॥ गृद्ध बोला-'कुमार्गमें जाने वाले अर्थात् अनुचित काम करने वाले अभिमानी राजाके मंत्री लोग, कुमार्गमें जाने वाले तथा मत्त वाले हाथीवानोंके समान, निश्चय करके निन्दाको पाते हैं ॥ १६ ॥ शृणु देव ! किमस्माभिर्बलदर्पाह्दुर्गं भग्नम् ? न; किंतु तव प्रतापाधिष्ठितेनोपायेन।' राजाह—'भवतामुपायेन।' गृध्रो ब्रूते— ‘यद्यस्मद्वचनं क्रियते तदा स्वदेशे गम्यताम् । अन्यथा वर्षाकाले प्राप्ते पुनर्विग्रहे सत्यस्माकं परभूमिष्ठानां स्वदेशगमनमपि दुर्लभं भविष्यति । सुखशोभार्थं संधाय गम्यताम् । दुर्गं भग्नं कीर्तिश्च लब्धैव । मम संमतं तावदेतत् । सुनिये महाराज ! क्या हमने बलके घमंडसे गढ़ तोड़ा है ? यह बात नहीं है । परन्तु आपके प्रतापसे निश्चित किये उपायसे तोड़ा है।' राजा बोला-'तुम्हारे उपायसे टूटा है।' गिद्ध बोला-'जो मेरा कहना मानो तो अपने देशमें चले चलो। नहीं तो वर्षा आने पर फिर लड़ाई होनेमें, पराई भूमिमें रहने वाले हम लोगोंका अपने देशको जाना भी कठिन होगा। इसलिये सुख और शोभाके लिये मेल करके चलिये, गढ़ टूट गया और यश भी मिला । मेरी तो यह राय है । यतः,— यो हि धर्मं पुरस्कृत्य हित्वा भर्तुः प्रियाऽप्रिये । अप्रियाण्याह तथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १७ ॥ क्योंकि—जो मनुष्य धर्मको आगे रख कर स्वामीके प्रिय और अप्रियको छोड़ कर अप्रिय भी सत्य कहता है उससे राजाको सहारा होता है, अर्थात् कटु भले हो, सच्चा और योग्य सलाह देने वालाही मंत्री राजाका सचमुच सहायकती होता है ॥ १७ ॥ अन्यच्च,— सुहृद्बलं तथा राज्यमात्मानं कीर्तिमेव च । युधि संदेहदोलास्थं को हि कुर्याद्बालिशः ? ॥ १८ ॥

Page 248Permalink

२२८ हितोपदेशः [ संधिः १९ -

दूसरे-और कौनसा बुद्धिमान् मित्रकी सेनाको, राज्यको, अपनेको, और कीर्तिको संग्रामके संदेहरूपी हिंडोलेमें झुलावेगा अर्थात् संकटमें गिरा देगा ॥१८॥ अपरं च,— संधिमिच्छेत् समेनापि संदिग्धो विजयो युधि । सुन्दोपसुन्दावन्योन्यं नष्टौ तुल्यबलौ न किम् ?' ॥ १९ ॥ और समानके साथ भी मेल करनेकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि युद्धमें विजयका संदेह है । जैसे समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द आपसमें क्या नष्ट नहीं हो गये ?' ॥ १९ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—

कथा ९ सुन्द उपसुन्द नामक दो दैत्योंकी कहानी ९ ] 'पुरा दैत्यौ महोदारौ सुन्दोपसुन्दनामानौ महता क्लेशेन त्रैलो- क्यकामनया चिराच्चन्द्रशेखरमाराधितवन्तौ । ततस्तयोर्भगवान् परितुष्टः 'वरं वरयतम्' इत्युवाच । अनन्तरं तयोः समधिष्ठि- तया सरस्वत्या तावन्वद्वक्तुकामावन्यदभिहितवन्तौ । यद्यावयो- र्भगवान् परितुष्टस्तदा स्वप्रियां पार्वतीं परमेश्वरो ददातु । अथ भगवता क्रुद्धेन वरदानस्यावश्यकतया विचारमूढयोः पार्वती प्रदत्ता । ततस्तस्या रूपलावण्यलुब्धाभ्यां जगद्धातिभ्यां मनसो- त्सुकाभ्यां पापतिमिरान्यां ममेत्यन्योन्यकलहाभ्यां प्रमाणपुरुषः कश्चित् पृच्छ्यतामिति मतौ कृतायां स एव भट्टारको वृद्धद्विज- रूपः समागत्य तत्रोपस्थितः । अनन्तरम् 'आवाभ्यामीयं स्वबल- लब्धा, कस्येयमावयौर्भवति ?' इति ब्राह्मणमपृच्छताम् । 'पहले बड़े उदार सुन्द और उपसुन्द नाम दो दैत्योंने बड़े क्लेशसे तीनों लोककी इच्छासे बहुत काल तक महादेवजीकी आराधना की । फिर उन दोनों पर भगवान्ने प्रसन्न हो कर यह कहा कि “वर माँगो” । फिर हृदयमें स्थित सर- स्वतीकी प्रेरणासे वे दोनों, कहना तो कुछही चाहते थे और कुछका कुछ कह दिया कि जो हम दोनों पर भगवान् प्रसन्न हैं तो परमेश्वर अपनी प्रिया पार्वती-

Page 249Permalink

जीको दें । पीछे भगवान्‌ने क्रोधसे वरदान देने की आवश्यकतासे उन विचारहीन मूर्खोंको पार्वतीजी दे दी । तब उनके रूप और सुन्दरतासे लुभाये संसारके नाश करने वाले, मनमें उत्कंठित, कामसे अंधे तथा 'यह मेरी है मेरी है' ऐसा आपसमें झगड़ा करने वाले इन दोनोंकी "किसी निर्णय करने वाले पुरुषसे पूछना चाहिये" ऐसी बुद्धि करने पर स्वयं ईश्वर बूढ़े ब्राह्मणके वेषसे आ कर वहाँ उप- स्थित हुए । पीछे, 'हम दोनोंने अपने बलसे इनको पाया है; हम दोनोंमेंसे यह किसकी है ?'—ऐसा ब्राह्मणसे पूछा । ब्राह्मणो ब्रूते,— 'वर्णश्रेष्ठो द्विजः पूज्यः क्षत्रियो बलवानपि । धनधान्याधिको वैश्यः शूद्रस्तु द्विजसेवया ॥ २० ॥ ब्राह्मण बोला—'वर्णोंमें श्रेष्ठ होनेसे ब्राह्मण, बली होनेसे क्षत्रिय, अधिक धन- धान्यवान् होनेसे वैश्य और इन तीनों वर्णोंकी सेवासे शूद्र पूज्य होता है ॥२०॥ तद्युवां क्षत्रधर्मानुगौ, युद्ध एव युवयोर्नियमः।' इत्यभिहिते सति 'साधुक्तमनेन' इति कृत्वाऽन्योन्यतुल्यवीर्यौ समकालमन्योन्यघा- तेन विनाशमुपगतौ । अतोऽहं ब्रवीमि—"संधिमिच्छेत् समेनापि" इत्यादि ॥' राजाह—'प्रागेव किं नोक्तं भवद्भिः ?'। मन्त्री ब्रूते—'मद्वचनं किमवसानपर्यन्तं श्रुतं भवद्भिः ? तदापि मम संमत्या नायं विग्रहारम्भः । साधुगुणयुक्तोऽयं हिरण्यगर्भो न विग्राह्यः। गिद्ध बोला—'इसलिये तुम दोनों क्षत्रियधर्म पर चलने वाले होनेसे तुम दोनोंका युद्ध ही नियम है । ऐसा कहते ही "यह इसने अच्छा कहा" यह कह कर समान बल वाले वे दोनों एक ही समय आपसमें लड़ कर मर गये । इसलिये मैं कहता हूँ—"समान बल वाले के साथ भी संधि करनी चाहिये" इत्यादि।' राजा बोला-'तुमने पहलेही क्यों नहीं कहा ?' मंत्रीने कहा-क्या मेरी बात आपने अंत तक सुनी थी ? तोभी मेरी संमतिसे यह युद्ध आरंभ नहीं हुआ है । सुन्दर गुणोंसे युक्त यह हिरण्यगर्भ विरोध करनेके योग्य नहीं है । तथा चोक्तम्,— सत्यार्यौ धार्मिकोऽनार्यो भ्रातृसंघातवान् बली । अनेकयुद्धविजयी संधेयाः सप्त कीर्तिताः ॥ २१ ॥

Page 250Permalink

२३० हितोपदेशः [ संधिः २२- जैसा कहा है—सत्य बोलने वाला, सज्जन, धर्मशील, दुर्जन, अधिक भाई- बंधु वाला, शूरवीर और अनेक संग्रामोंमें जय पाने वाला ये सात मनुष्य सन्धि करनेके योग्य कहे गये हैं ॥ २१ ॥ सत्योऽनुपालयेत् सत्यं संधितो नैति विक्रियाम् । प्राणबाधेऽपि सुव्यक्तमार्यों नायात्यनार्यताम् ॥ २२ ॥ सत्यभाषी सत्यके अनुसार संधि करके विश्वासघात नहीं करता है, और सज्जन प्राण जाने पर भी प्रत्यक्षमें नीचता नहीं करता है ॥ २२ ॥ धार्मिकस्याभियुक्तस्य सर्व एव हि युध्यते । प्रजानुरागाद्धर्माच्च दुःखोच्छेद्यो हि धार्मिकः ॥ २३ ॥ शत्रुओंसे घिरे हुए धार्मिकके सभी अनुकूल होते हैं इसलिये धर्मसे तथा प्रजाके अनुरागसे धार्मिक राजा दुःखसे जीतनेके योग्य होता है ॥ २३ ॥ संधिः कार्योंऽप्यनार्येण विनाशे समुपस्थिते । विना तस्याश्रयेणार्यों न कुर्यात् कालयापनम् ॥ २४ ॥ विनाश उपस्थित होने पर दुष्टके साथ भी मेल कर लेना चाहिये और उसके आश्रयके विना सज्जनको कालयापन (समय काटना) नहीं करना चाहिये ॥ २४ ॥ संहतत्वाद्यथा वेणुर्निबिडैः कण्टकैर्वृतः । न शक्यते समुच्छेत्तुं भ्रातृसंघातवांस्तथा ॥ २५ ॥ और जैसे बहुतसे काँटोंसे लदा हुआ बाँस आपसमें मिले रहनेसे नहीं कट सकता है वैसे ही भाई-बन्धुओंसे मिला हुआ पुरुष भी नष्ट नहीं हो सकता है २५ बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् । प्रतिवातं न हि घनः कदाचिदुपसर्पति ॥ २६ ॥ बली शत्रुके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसा उदाहरण नहीं है, क्योंकि बादल पवनके प्रतिकूल कभी नहीं चलता है, अर्थात् जिधरको पवन जाती है उधरको ही चलता है ॥ २६ ॥ जमदग्नेः सुतस्येव सर्वैः सर्वत्र सर्वदा । अनेकयुद्धजयिनः प्रतापादेव भुज्यते ॥ २७ ॥ और जमदग्निके पुत्र अर्थात् परशुरामके समान अनेक युद्धोंमें जीतने वाले राजाके प्रतापसे बहुतसे संग्रामोंमें सब मनुष्य सब स्थानमें सब कालमें पराये राजाको अधिकारमें कर लेते हैं ॥ २७ ॥

Page 251Permalink

-३२] सन्धिका गुणदोषकथन २३१ अनेकयुद्धविजयी संधानं यस्य गच्छति । तत्प्रतापेन तस्याशु वशमायान्ति शत्रवः ॥ २८ ॥ अनेक संग्रामोंमें जीतने वाला मनुष्य जिस राजासे मेल कर लेता है तो उसके प्रतापसे (जिसके साथ संधि की है) उसके शत्रु शीघ्र वशमें हो जाते हैं ॥२८॥ तत्र तावद्बहुभिर्गुणैरुपेतः संधेयोऽयं राजा।' चक्रवाकोऽवद- त्—'प्रणिधे ! सर्वत्रावव्रज । सर्वमवगतम् । गत्वा पुनरा गमिष्य- सि।' राजा चक्रवाकं पृष्टवान्—'मन्त्रिन् ! असंघेयाः कति तान्श्रोतुमिच्छामि ।' इसलिये अनेक गुणोंसे युक्त यह राजा मेल करनेके योग्य है।' चकवा कहने लगा—'हे दूत ! सब स्थानोंमें जा, तुमने सब समझ लिया है, और जा कर फिर लोट आना।' राजाने चकवेसे पूछा-'हे मंत्री ! कितने मनुष्य संधि करनेके योग्य नहीं हैं, उन्हें सुनना चाहता हूँ।' मन्त्री ब्रूते—'देव ! कथयामि । शृणु,— मंत्री बोला-महाराज ! कहता हूँ सुनिये— बालो वृद्धो दीर्घरोगी तथा ज्ञातिबहिष्कृतः । भीरुको भीरुजनको लुब्धो लुब्धजनस्तथा ॥ २९ ॥ बालक, बूढ़ा, बहुत दिनोंका रोगी और जाति बाहर किया हुआ, डरपोक, भय उत्पन्न करने वाला, लोभी और जिसका लोभी मंत्री हो ॥ २९ ॥ विरक्तप्रकृतिश्चैव विषयेष्वतिसक्तिमान् । अनेकचित्तमन्त्रस्तु देवब्राह्मणनिन्दकः ॥ ३० ॥ और रूठी हुई प्रजा वाला, विषयभोगादिमें आसक्त, अनेकोंके चित्तमें जिसका मंत्र रहे अर्थात् जिसका मंत्र गुप्त न हो, और देवता-ब्राह्मणोंकी निन्दा करने वाला हो ॥ ३० ॥ दैवोपहतकश्चैव तथा दैवपरायणः । दुर्भिक्षव्यसनोपेतो बलव्यसनसंकुलः ॥ ३१ ॥ भाग्यहीन, प्रारब्धकी चिन्ता करने वाला, अकालके दुःखसे दुःखी और सेनाकी पीडासे व्याकुल हो ॥ ३१ ॥ अदेशस्थो बहुरिपुर्युक्तः कालेन यश्च न । सत्यधर्मव्यपेतश्च विंशतिः पुरुषा अमी ॥ ३२ ॥

Page 252Permalink

२३२ हितोपदेशः [ संधिः ३३- दूसरेके राज्यमें रहने वाला, बहुतसे शत्रुओंसे युक्त, वे अवसर लडाई ठानने वाला, और सत्य धर्मसे रहित, ये बीस पुरुष हैं ॥ ३२ ॥ एतैः संधिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केवलम् । एते विगृह्यमाणा हि क्षिप्रं यान्ति रिपोर्वशम् ॥ ३३ ॥ इनके साथ सन्धि न करे, केवल ही संग्राम करे, क्योंकि ये लड़ कर अवश्य शीघ्र ही शत्रुके वशमें आ जाते हैं ॥ ३३ ॥ बालस्याल्पप्रभावत्वान्न लोको योद्धुमिच्छति । युद्धायुद्धफलं यस्माज्ज्ञातुं शक्तो न बालिशः ॥ ३४ ॥ बालकके थोड़े प्रताप होनेसे पुरुष युद्ध (विरोध)करनेकी इच्छा नहीं करता है, क्योंकि बालक लड़ने और नहीं लड़नेका फल ( भला या बुरा ) नहीं जान सकता है ॥ ३४ ॥ उत्साहशक्तिहीनत्वाद्वृद्धो दीर्घामयस्तथा । स्वैरेव परिभूयेते द्वावप्येतावसंशयम् ॥ ३५ ॥ और वृद्ध तथा बहुत कालका रोगी ये दोनों, उत्साह और शक्तिसे हीन होनेके कारण अवश्य आप ही पराजय पाते हैं ॥ ३५ ॥ सुखोच्छेद्यो हि भवति सर्वज्ञातिबहिष्कृतः । त एवैनं विनिघ्नन्ति ज्ञातयस्त्वात्मसात्कृताः ॥ ३६ ॥ सब जातिसे बाहर निकाला गया शत्रु सहजही मारा जा सकता है, क्योंकि उसी जातिके ही मनुष्य इसके धनादिको अपने वशमें करके इसको मार डालते हैं ॥ ३६ ॥ भीरुर्युद्धपरित्यागात् स्वयमेव प्रणश्यति । तथैव भीरुपुरुषः संग्रामे तैर्विमुच्यते ॥ ३७ ॥ और डरपोक मनुष्य युद्धमें पीठ दे कर भाग जानेसे अपने आप ही नष्ट हो जाता है, और उस डरपोकको संग्राममें उसके साथी भी छोड़ देते हैं ॥ ३७ ॥ लुब्धस्यासंविभागित्वान्न युध्यन्तेऽनुयायिनः । लुब्धानुजीविकैरेष दानभिन्नैर्निहन्यते ॥ ३८ ॥ और यथा योग्य भाग नहीं देनेसे लोभीकी सेनाके लोग नहीं लड़ते हैं और पारितोषिक नहीं पाने वाले लोभी सेवकोंसे वह मार डाला जाता है-अर्थात् विपत्ति आने पर वे उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥ ३८ ॥

Page 253Permalink

-४५ ] उन्नतिपथमें अनुचित कृत्यसे हानि २३३ संत्यज्यते प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि । सुखाभियोज्यो भवति विषयेष्वतिसक्तिमान् ॥ ३९ ॥ बिगड़ी हुई प्रजा वाला ( राजा ) युद्धमें प्रजासे छोड़ दिया जाता है, और जो विषयोंमें अधिक आसक्त होकर रहता है वह सहजहीमें हराया जा सकता है ॥ ३९ ॥ अनेकचित्तमन्त्रस्तु भेद्यो भवति मन्त्रिणा । अनवस्थितचित्तत्वात् कार्यतः स उपेक्ष्यते ॥ ४० ॥ अनेक मनुष्योंसे गुप्त परामर्शको प्रकट करने वालेकी मंत्रीके साथ फूट हो जाती है, और अनवस्थित(डामाडोल) चित्तके कारण कार्यमें मंत्री उसे छोड़ देता है ॥ सदा धर्मबलीयस्त्वाद्देवब्राह्मणनिन्दकः । विशीर्यते स्वयं ह्येष दैवोपहतकस्तथा ॥ ४१ ॥ धर्मके कारण बलवान् होनेसे भी, देवता और ब्राह्मणोंकी निंदा अथवा अवज्ञा करने वाला और प्रारब्धहीन निस्सन्देह अपने आपही नाश हो जाता है ॥४१॥ संपत्तेश्च विपत्तेश्च दैवमेव हि कारणम् । इति दैवपरो ध्यायन् नात्मानमपि चेष्टते ॥ ४२ ॥ संपत्ति और विपत्तिका प्रारब्ध ही कारण है ऐसा सोच कर केवल प्रारब्धको (ही प्रधान) मानने वाला अपने आपको काममें नहीं लगाता है ॥ ४२ ॥ दुर्भिक्षव्यसनी चैव स्वयमेव विषीदति । बलव्यसनयुक्तस्य योद्धुं शक्तिर्न जायते ॥ ४३ ॥ दुर्भिक्षकी पीड़ासे दुखी प्रजा वाला राजा आप ही दुर्बल होता है और पीड़ित सेना वालेको लड़नेकी शक्ति नहीं होती है, अर्थात् नष्ट हो जाती है ॥ ४३ ॥ अदेशस्थो हि रिपुणा स्वल्पकेनापि हन्यते । ग्राहोऽल्पीयानपि जले गजेन्द्रमपि कर्षति ॥ ४४ ॥ पराये राज्यमें रहने वाला राजा थोड़े शत्रुओंसे भी मारा जाता है, क्योंकि जलमें छोटेसे छोटाभी मकर बड़े हाथीको खींच लेता है ॥ ४४ ॥ बहुशत्रुस्तु संत्रस्तः श्येनमध्ये कपोतवत् । येनैव गच्छति पथा तेनैवाशु विपद्यते ॥ ४५ ॥ बहुतसे शत्रु वाला, डरा हुआ मनुष्य, बाज पक्षियोंके मध्यमें कबूतरके समान जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गसे दुखी होता है ॥ ४५ ॥

Page 254Permalink

२३४ हितोपदेशः [ संधिः ४६- अकालसैन्ययुक्तस्तु हन्यते कालयोधिना । कौशिकेन हतज्योतिर्निशीथ इव वायसः ॥ ४६ ॥ युद्धके अनुचित समयमें सेनासे युक्त भी मनुष्य उचित समय पर लड़ने वालेसे आधी रातमें नहीं दीखनेके कारण उलूकसे मारे हुए कागके समान मारा जाता है ॥ सत्यधर्मव्यपेतेन संदध्यान्न कदाचन । स संधितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ ४७ ॥ सत्य तथा धर्मरहितके साथ कभी मेल न करना चाहिये, क्योंकि वह संधिके हो जाने पर भी असज्जनताके कारण तुरन्त पलट जाता है ॥ ४७ ॥ अपरमपि कथयामि । संधिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गु- ण्यम् । कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनि- पातप्रतीकारः कार्यसिद्धिश्च पञ्चाङ्गो मन्त्रः । सामदानभेददण्डा- श्चत्वार उपायाः । उत्साहशक्तिर्मन्त्रशक्तिः प्रभुशक्तिश्चेति शक्ति- त्रयम् । एतत्सर्वमालोच्य नित्यं विजिगीषवो भवन्ति महान्तः । और भी कहता हूँ—संधि (मैत्रीभाव), विग्रह (युद्ध), यान (यात्रा), आसन (समय देखना), संश्रय (आश्रय लेना), द्वैधीभाव (छल), ये छः गुण हैं और कर्मोंके आरंभका यत्न, पुरुष और द्रव्यका संग्रह, देशकालका विभाग और विनिपातप्रतीकार (आपत्तिका दूर करना), कार्यसिद्धि ये पाँच विचारके अंग हैं । साम, दान, भेद, दंड ये चार उपाय हैं और उत्साहशक्ति, मन्त्रशक्ति और प्रभुशक्ति ये तीन शक्तियाँ हैं । इन सबको विचार कर बड़े पुरुष जीतनेकी इच्छा करने वाले होते हैं ॥ या हि प्राणपरित्यागमूल्येनापि न लभ्यते । सा श्रीर्नीतिविदं पश्य चञ्चलापि प्रधावति ॥ ४८ ॥ जो लक्ष्मी प्राणत्यागरूपी मोलसे भी नहीं मिलती है वह लक्ष्मी चंचला होनेसे भी नीति जानने वालोंके घर दौड़ती है, अर्थात् उनके वहाँ निवास करती है ॥ ४८ ॥ तथा चोक्तम् ,— जैसा कहा है,—

Page 255Permalink

-५० ] राजा का सन्धि करने में हठ २३५ वित्तं यदा यस्य समं विभक्तं गूढश्चरः संनिभृतश्च मन्त्रः । न चाप्रियं प्राणिषु यो ब्रवीति स सागरान्तां पृथिवीं प्रशास्ति ॥ ४९ ॥ जिसका धन बराबर बाँट दिया गया है, तथा दूत गुप्त है, और मंत्र प्रका- शित नहीं है, और जो प्राणियोंसे अप्रिय (कटु) वचन नहीं बोलता है वह समुद्रपर्यन्त पृथिवीका राज्य करता है अर्थात् चक्रवर्ती राजा हो जाता है ॥४९॥ किंतु यद्यपि महामन्त्रिणा गृध्रेण संधानमुपन्यस्तं तथापि तेन राज्ञा संप्रति भूतजयदर्पान्न मन्तव्यम् । देव ! तदेवं क्रियताम् । सिंहलद्वीपस्य महाबलो नाम सारसो राजाऽस्मन्मित्रं जम्बुद्वीपे कोपं जनयतु । परन्तु यद्यपि महामंत्री गिद्धने संधि करनेका आरंभ किया है तोभी वह राजा विजय होनेके घमंडसे अब नहीं मानता है, इसलिये महाराज ! ऐसा कीजिये कि सिंहलद्वीपका राजा महाबल नाम सारस हमारा मित्र जम्बूद्वीप पर कोप करे । यतः,— सुगुप्तिमाधाय सुसंहतेन बलेन वीरो विचरन्नरातिम् । संतापयेद्येन समं सुतप्त- स्तप्तेन संधानमुपैति तप्तः ॥ ५० ॥ क्योंकि—वीर, बड़े गुप्त प्रकारसे अनुरक्त सेनाके द्वारा शत्रुको घेर कर पीड़ा दे कि जिस पीड़ासे वह समान तप्ता अर्थात् उग्र हो जाय, क्योंकि तप्ता तत्तेके साथ मिल जाता है, अर्थात् तुल्य पराक्रम वाला सहजमें मिला लिया जाता है ॥ ५० ॥ राज्ञा 'एवमस्तु' इति निगद्य विचित्रनामा बकः सुगुप्तलेखं दत्त्वा सिंहलद्वीपं प्रहितः । राजाने 'बहुत अच्छा' ऐसा कह कर विचित्र नाम बगुलेको गुप्त चिट्ठी दे कर सिंहलद्वीपको भेज दिया ।

Page 256Permalink

२३६ हितोपदेशः [ संधिः ५१- अथ प्रणिधिरागत्योवाच—'देव ! श्रूयतां तत्रत्यप्रस्तावः । एवं तत्र गृध्रेणोक्तम्—'देव ! यन्मेघवर्णस्तत्र चिरमुषितः स वेत्ति किं संधेयगुणयुक्तो हिरण्यगर्भो न वा ?' इति । ततोऽसौ राज्ञा समाहूय पृष्टः—'वायस ! कीदृशोऽसौ हिरण्यगर्भः ? चक्रवाको मन्त्री वा कीदृशः ?' वायस उवाच—'देव ! हिरण्यगर्भो राजा युधिष्ठिरसमो महाशयः, चक्रवाकसमो मन्त्री न क्वाप्यवलो- क्यते ।' राजाह—'यद्येवं तदा कथमसौ त्वया वञ्चितः ?' । फिर दूतने आ कर कहा-'महाराज ! वहाँका समाचार सुनिये । वहाँ गिद्धने यों कहा है कि हे महाराज ! मेघवर्ण काक जो वहाँ बहुत दिनों तक रहा था वह जानता है कि हिरण्यगर्भ मिलापके योग्य गुणोंसे युक्त है या नहीं।' फिर राजाने उसे बुला कर पूछा-'हे कौए ! वह हिरण्यगर्भ कैसा है?' और चकवा मंत्री कैसा है ?' कौएने उत्तर दिया-'महाराज ! राजा हिरण्यगर्भ युधिष्ठिरके समान सज्जन है; चकवेके समान मंत्री कहीं भी नहीं दीखा है।' राजा बोला—'जो ऐसाही है तो तूने उसे कैसे ठग लिया ?' विहस्य मेघवर्णः प्राह—'देव ! मेघवर्णने हँस कर कहा-'महाराज ! विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता ? । अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हत्वा किं नाम पौरुषम् ? ॥ ५१ ॥ विश्वास करने वाले मनुष्योंको ठगनेमें क्या चतुराई है ? जैसे गोदमें लेट कर सोए हुएको मार देनेमें कौनसा पुरुषार्थ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ५१ ॥ शृणु देव ! तेन मन्त्रिणाहं प्रथमदर्शन एव ज्ञातः । किंतु महाशयो- ऽसौ राजा । तेन मया विप्रलब्धः । सुनिये महाराज ! उस मंत्रीने पहले देखते ही मुझे जान लिया था, परन्तु वह राजा बड़ा सज्जन है इसलिये मेरी ठगाईमें आ गया; तथा चोक्तम्,— आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् । स तथा वञ्च्यते धूर्तैर्ब्राह्मणश्छागतो यथा' ॥ ५२ ॥

राजा बोला—'यह कथा कैसी है ? मेघवर्ण कहने लगा ।—

Page 257Permalink

-५३ ] ब्राह्मणका ठगोंसे ठगा जाना २३७ जैसा कहा है—जो मनुष्य अपने समान दुर्जनको सत्य बोलने वाला समझता है वह मनुष्य वैसाही ठगा जाता है, जैसा बकरेके कारण धूर्त्तोंने ब्राह्मणको ठगा लिया' ॥ ५२ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ? मेघवर्ण कहने लगा ।— कथा १० [ एक ब्राह्मण, बकरा और तीन ठगोंकी कहानी १० ] 'अस्ति गौतमस्यारण्ये प्रस्तुतयज्ञः कश्चिद्ब्राह्मणः। स च यज्ञार्थं ग्रामान्तराच्छागमुपक्रीय स्कन्धे कृत्वा गच्छन् धूर्तत्रयेणावलो- कितः । ततस्ते धूर्ता 'यद्येष च्छागः केनाप्युपायेन लभ्यते तदा मतिप्रकर्षो भवति' इति समालोच्य वृक्षत्रयतले क्रोशान्तरेण तस्य ब्राह्मणस्यागमनं प्रतीक्ष्य पथि स्थिताः । तत्रैकेन धूर्तेन गच्छन्स ब्राह्मणोऽभिहितः—'भो ब्राह्मण ! किमिति कुक्कुरः स्कन्धेनोह्यते ?'। विप्रेणोक्तम्—'नायं श्वा; किंतु यज्ञच्छागः।' अथानन्तरस्थितेना- न्येन धूर्तेन तथैवोक्तम् । तदाकर्ण्य ब्राह्मणश्छागं भूमौ निधाय मुहुर्निरीक्ष्य पुनः स्कन्धे कृत्वा दोलायमानमतिश्चलितः । 'गौतमके वनमें किसी ब्राह्मणने यज्ञ करना आरंभ किया था। और उसको यज्ञके लिये दूसरे गाँवसे बकरा मोल ले कर कंधे पर रख कर ले जाते हुए तीन ठगोंने देखा । फिर उन ठगोंने "यह बकरा किसी उपायसे मिल जाय तो बुद्धिकी चालाकी बढ़ जाय" यह विचार कर तीनों तीन वृक्षोंके नीचे, एक एक कोसके अन्तरसे, उस ब्राह्मणके आनेकी बाट देख कर मार्गमें बैठ गये । वहाँ एक धूर्त्तने जा कर उस ब्राह्मणसे कहा—'हे ब्राह्मण ! यह क्या बात है कि कुत्ता कंधे पर लिये जाते हो ?' ब्राह्मणने कहा,-'यह कुत्ता नहीं है, यज्ञका बकरा है।' फिर इससे आगे बैठे हुए दूसरे धूर्तने वैसे ही कहा। यह सुन कर ब्राह्मण बकरेको धरनी पर रख कर बार बार देख फिर कंधे पर रख कर चलायमान चित्त-सा हो कर चलने लगा । यतः,— मतिर्दोलायते सत्यं सतामपि खलोक्तिभिः । ताभिर्विश्वासितश्चासौ म्रियते चित्रकर्णवत्' ॥ ५३ ॥