इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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धर्म-प्रधान एवं कर्म-प्रवीण भारत में समय-समय पर अनेक ऋषि, मुनि, कवि, विद्वान् तथा विदुषियों ने जन्म ग्रहण कर इस भूमि को अलंकृत किया है। हमारे पूर्वजों ने अपनी सतत साधना, अखण्ड निष्ठा एवं शुद्ध आस्तिकता के फलस्वरूप जिन लोक मंगलकारी अनुभवों का संचय किया उन्हें 'सर्वजन हिताय' प्रस्तुत कर न केवल भारत का, अपितु समस्त विश्व का कल्याण सम्पादित किया है। मनु को इस देश की आचार परम्परा की मान्यता एवं प्रामाणिकता पर गर्व है। उनका कहना है-
एतद्वदेशप्रसृतस्य सकाशादप्य जन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिखेरन् पृथिव्यां सर्वं मानवाः॥
'इस देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण से, पृथ्वी के समस्त मानव अपना चरित्र सीखें।'
भयवान् मनु की यह गर्वोक्ति मिथ्या नहीं सर्वथा सत्य है भारत ने एक सुदीर्घ समय तक आचार के सम्बन्ध में जगत् का नेतृत्व किया है। परन्तु कालक्रमेण वही भारत अवनीति के ऐसे गहरे गर्त में गिरता चला गया कि उसका वह सनातन और पुरातन स्वरूप अविश्वसनीय बनकर कल्पना प्रसृत मात्र प्रतीत होने लगा। ऐसा क्यों? कारण स्पष्ट है। हमारी वैदिक पद्धति में जिस आश्रम व्यवस्था को ऐहलौकिक सुखसिद्धि तथा पारलौकिक कल्याण का प्रभुख हेतु माना है उस आश्रम-व्यवस्था की अवहेलना ही अधोगति का कारण बनी। यद्यपि चारों आश्रमों में प्रथम आश्रम को मानव जीवन की नींव कहा है, जिसकी दृढ़ता एवं पुष्टता पर ही इस
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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