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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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जीवन भवन का सुदृढ़ एवं सुपुष्ट होना सम्भव है तथापि गृहस्थ आश्रम को सब आश्रमों में गुरु माना है। मनु महाराज का कहना है—

यथा नदी नदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥

‘जिस प्रकार सब नदी और नद समुद्र में स्थिति को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार सभी आश्रम वाले गृहस्थ से भरण-पोषण पाने के कारण उसी पर स्थित हैं।’

जिस गृहस्थ पर अपने भरण-पोषण के साथ-साथ अन्य आश्रमियों के भरण-पोषण का भी दायित्व है उसे कितना शक्ति सम्पन्न होना चाहिये यह किसी भी मतिमान से अगोचर नहीं। वस्तुतः दुर्बल इन्द्रिय वालों को इस आश्रम में प्रवेश का अधिकार ही नहीं। जब एक गृहस्थ पर इस प्रकार भार है तो उसे अपनी शक्ति को संचित करने एवं सुरक्षित रखने का सदा ध्यान होना चाहिये। शारीरिक शक्ति मानसिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को लिये नियत दिनचर्या एवं समुचित आहार-विहार ही एकमात्र कारण है। इस पर हमारे प्राचीन आर्य ग्रन्थों ने बड़ा बल दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने चिरप्रस्तुत आश्रम व्यवस्था को पुनः जागृत करने के लिये प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का शुभ-सन्देश देश को दिया। प्रथम आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत पालन पूर्वक नियत दिनचर्या का सतत अभ्यासी बालक जब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेगा तो वह सद्गृहस्थ सिद्ध होगा। अन्यथा गृहस्थ के पुनीत कर्तव्य से विमुख या वंचित ही बना रहेगा। इन्हीं सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए श्री वीरेन्द्र गुप्त ने प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन किया है।

सुयोग्य लेखक ने अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर तथा अनुभव विद्वज्जनों का सम्पर्क ग्रहण कर जिस कठिन परिश्रम के साथ इस पुस्तक को लिखा है वह सतशः स्तुत्य है। सादी भाषा में जिन जीवनोपयोगी अनुभवों को अंकित किया है वे वस्तुतः

इच्छानुसार सन्तान

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri