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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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असावधानी के कारण यह केशाद कीटाणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जायें तो यह गर्भ में गर्भित रजः वीर्य और भ्रूण को खा जाते हैं। इसी कारण गर्भ स्थित नहीं हो पाता। ऐसी दशा में रात्रि को सोते समय एक ताजा हरी मूली को भली प्रकार चाकू तथा जल से स्वच्छ करके स्त्री अपनी योनि में रखे। प्रातः निकालने पर आप देखेंगे कि मूली पर अनेक काले रंग के बारीक-बारीक कीटाणु लगे हुए हैं। यही केशाद नाम के कीटाणु हैं जो गर्भ में भ्रूण को खा जाते हैं। उस मूली को सावधानी के साथ दूर कहीं फेंक दें। इसी प्रकार मूली का निरन्तर प्रयोग करें। जब तक कीटाणु निकलने बन्द न हो जायें। जब इन कीटाणुओं से गर्भाशय स्वच्छ हो जायेगा तो निश्चय ही गर्भ स्थित हो जायेगा।

४- रजः वीर्य के दूषित हो जाने पर स्त्रियों के लिए सुपारीपाक और पुरुषों के लिए बानरी गुटका प्रयोग करना और ३ मास तक ब्रह्मचर्य से रहना उत्तम रहेगा। यह योग 'कुष्ठ अनुभव' में देखें।

५- बन्ध्यापन तो एक प्रकार से असाधारण अवस्था है जो सातवीं रात्रि में गर्भाधान करने का फल होता है। फिर भी प्रभु से याचना करते हुए स्त्री को नारी रत्न चूर्ण का (कुष्ठ अनुभव का प्रयोग नं. २५) ४-४ माशा प्रातः सायं जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से ६ मास तक निरन्तर प्रयोग कराने से लाभ हो सकता है। यदि प्रभु की कृपा हुई तो अवश्य ही गर्भ स्थित होगा।

६- जनित इन्द्रियों की लघुता-दीर्घता का तो विवाह से पूर्व ही जान लेना उचित है। क्योंकि यदि स्त्री की योनि गहरी और पुरुष की इन्द्रिय छोटी होगी तो ना तो स्त्री ही सन्तुष्ट होगी और न ही वीर्य गर्भाशय तक पहुँचेगा और यदि स्त्री की योनि कम गहरी और पुरुष की इन्द्रिय लम्बी होगी तो स्त्री को अधिक कष्ट होने के कारण वीर्य अपने स्थान पर नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए इसकी जानकारी विवाह से पूर्व करा लेना उचित रहता है। इसको भली प्रकार समझने और परीक्षा करने के लिए वात्सायन काम सूत्र

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri