इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextगर्भावस्था में मैथुन
शास्त्रों ने गर्भावस्था में समागम करने के लिए निषेध किया है। इससे गर्भ में बच्चे के अंगों को हानि पहुँचती है। जब बच्चे के अंग बन जाते हैं तो उसके अंग समागम करने से विकृत हो जाते हैं और बच्चा बुद्धिहीन होकर कामी पुरुष के रूप में सामने आता है ऐसे गर्भ के बच्चे ब्रह्मघर्ष का पालन नहीं कर सकते। यही कारण है कि भारत में ब्रह्मघर्ष के लिए स्थान नहीं। 'हमने देखा है कि हमारे देश में ऐसे-ऐसे दम्पति हैं जो बच्चे के जन्म होने से केवल २४ घण्टे पूर्व तक स्त्री समागम करते रहे हैं।' और जब बच्चा जन्म से ही रोगी होकर शरीर निर्बल, निकम्मा, जीर्ण होने के कारण उसे जीवात्मा छोड़ कर अन्तरिक्ष को चली जाती है। तो उस समय ईश्वर को दोष देते हैं या अपने भाग्य को कोसते हैं। परन्तु यह नहीं विचारते कि यह सब हमारे ही कर्म से ऐसा हुआ है। मैंने अपने कई मित्रों और अन्य कई व्यक्तियों से इस विषय पर चर्चा की, उन्होंने उत्तर दिया कि क्या करें हम अपने को वश में नहीं रख सकते जब स्त्री को देखा और हमारा रंग पलटा। स्मरण रहे जिस मास में जो जो अंग प्रत्यंग बच्चे के बनते हैं यदि उस मास में रति किया होती है तो उस-उस अंग-प्रत्यंग को क्षति पहुँचे बिना रह नहीं सकेगी।
हाय! भारतवर्ष देश तेरी यह दशा कि आजकल के दम्पति एक वर्ष के लिए भी स्त्री से अलग नहीं रह सकते। जबकि पशु भी गर्भित पशु से समागम नहीं करते। जब बुद्धिहीन योनिर्पी पशुओं में इतनी समझ है तो हम बुद्धिमान होकर भी ऐसा नहीं कर सकते। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो कृकर्मों द्वारा अपना शरीर, भविष्य और जीवन को नष्ट करें, और साथ में आने वाली सन्तति को भी नष्ट भ्रष्ट करें। क्या इतिहास को पढ़कर भी
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri