इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextशिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते? इस घटना को पढ़ो और विचारो, कि हमारे पूर्वज कितने दृढ़ संकल्पी थे।
आपने संस्कृति साहित्य में आचार्य कव्यट का नाम सुना होगा। जब इनका विवाह होकर पत्नी घर पर आई। आते ही आचार्य कव्यट ने अपनी पत्नी के सम्मुख यह प्रश्न रखा। 'देवी मैं महाभाव्य लिख रहा हूँ मेरी इच्छा है कि जब तक भाव्य लिखकर पूर्ण न हो जाय उस समय तक हम दोनों ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करें।' पत्नी ने उत्तर दिया प्रभु! जैसी आपकी इच्छा, मैं आपकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकती। आचार्य कव्यट उत्तर पाकर हर्षित हुए और अपने लेखन कार्य में निर्विघ्न लग गये।
आचार्य कव्यट को भाव्य लिखते लिखते इतना अधिक समय व्यतीत हो गया कि उन दोनों के केश पक कर खेत हो गये। आचार्य कव्यट का भाव्य पूर्ण हो चुका। दोनों दम्पति भूमि की कोमल हरियाली पर लेटे हुए हैं। चन्द्रमा की चाँदनी चहूँ और छिटक रही है। इस शीतल सुन्दर चन्द्र प्रपात में दोनों के खेत केश रजत सम चमक रहे हैं। कैसा सुहावना सुन्दर और आकर्षक समय है। दोनों दम्पति के चेहरों पर प्रसन्नता शान्ति और निर्भयता छटक रही है। ऐसे सुहावने समय में आचार्य कव्यट ने प्रेम पुरित मुखड़े को पत्नी की ओर कर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, 'प्रिय! भाव्य पूर्ण हो गया। मैं आज तुम्हें अपना प्रेम प्रदान कर सकता हूँ।' देवी पति के यह वचन सुनकर प्रसन्न चित्त हो बोलीं- 'प्रभु! वैसे तो मेरा सर्वस्व आपका ही है, प्रभु! मेरी और आपकी थोड़ी सी ही आयु शेष रही है। मेरी इच्छा है कि इस थोड़ी सी आयु में यह शरीर यदि अक्षुता ही रहे तो उत्तम है।' आचार्य कव्यट ने इसे सहर्ष स्वीकार किया, इस प्रकार दम्पति का सारा जीवन अक्षुता ही व्यतीत हो गया।
यह था हमारे भारतवर्ष का गौरवपूर्ण जीवन, जो विवाह के पश्चात् भी दो शरीर आजीवन अक्षुत रहे। आज यह कहा
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri