इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextमें शिक्षा पाने के लिये भेज दिया था। जो दीक्षान्त (समावर्तन) के पश्चात् सबके सब सन्यासी हो गये। जब सबसे कनिष्ठ पुत्र भी सन्यासी हो गया और उसके त्यागी हो जाने की सूचना राजा ऋतुध्वज को मिली, तो उसे बड़ा ही कष्ट हुआ। वह सोचता था कि तीसरा पुत्र तो अवश्य ही राज्याधिकारी होगा। जिससे अपने ही वंश में राज्य स्थिर रहेगा, पर यह क्या उलटा हो गया, और कोई पुत्र नहीं था जिसकी आशा की जाती। अतः राजा इस दुःख से अत्यन्त दुःखित होकर रंग महल की ओर चले आये। महारानी मदालसा ने उनके असमय पधारने और उदासी आदि लक्षणों से अनुमान लगाया कि आज कुछ दाल में काला है। और झट उठ कर हाथ में मोरछल ले पति के समीप उपस्थित हो प्रणाम कर विनीत भाव से पूछने लगी कि स्वामिन आज असमय पधारने का क्या कारण है। न जाने मेरी दृष्टि में कुछ अन्तर हो, कहते हुए भय लगता है। मैं आपके चित्त को उदास, मुखड़े को मलीन-सा पाती हूँ। जिससे मुझे वेदना हो रही है। बतलाइये क्या कहीं आक्रमण की आवश्यकता पड़ गई या कोई ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन रह गया, क्या प्रजा को किसी कर्मचारी के अन्याय व्यवहार से वेदना पहुँची है। अथवा आपके मन में कुछ वेदना है कृपया शीघ्र प्रकट कर मेरी शंका का निवारण कीजिए। तब राजा ने उत्तर दिया कि क्या कहें आज तीसरा पुत्र भी स्नातक हो गुरुकुल से निकलते ही सन्यासी हो गया। इसलिये इस परिवार से राज्य का क्षय और वंश का नाश दोनों एक ही साथ हो गये। यह वेदना है मेरे चित्त की। आज मेरी उन आशाओं पर कि एक पुत्र तो राजकाज सँभाल ही लेगा और उससे वंश भी चलेगा 'पानी फिर गया' जीवन में जब-जब यह स्मरण होगा तब-तब कुछ ना कुछ कष्ट का हेतु बना ही रहेगा।
तब मदालसा ने नम्रता, धैर्य, मधुरता और गम्भीरता से निवेदन किया कि आपकी वेदना का कारण मैं समझ गई। इस
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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