इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextसंसार चक्र में न जाने किस जीव का किससे सम्बन्ध हो जाता है। मैं समझती हूँ कि आपकी इस चिन्ता को दूर कर सकूँगी। इन तीनों को सन्यासी बनाने का कारण भी मैं ही हूँ मैंने उन्हें गर्भाधान से लेकर गुरुकुल जाने पर्यन्त तक त्याग वैराग्य की ही शिक्षा दी थी। फिर किस की सामर्थ्य थी, जो उन्हें सन्यासी होने से रोक लेता। अब आपकी इच्छा पूर्ति के लिये एक बार और कष्ट सहन कर ऐसा ही पुत्र उत्पन्न करूँगी जो राज्याधिकारी ही होगा। आप इस चिन्ता को दूर कर दीजिये। आपके हर्ष में अपना हर्ष और कष्ट में अपना कष्ट, अनुभव करना अपना धर्म समझती हूँ।
उस देवी ने फिर विधि पूर्वक सन्तानार्थ गर्भाधान कराया और ईश्वर की कृपा से पुत्र ही का जन्म हुआ। और क्यों न होता जबकि युगम अयुगम रानियों का विचार कर उसी लक्ष से गर्भाधान किया गया था। उसको उसने बड़ी सावधानी से राज्याधिकारी बनाने के विचार से पालन-पोषण किया। और उसी समय जब और बालक गुरुकुल भेजे गये थे वह भी भेज दिया गया। वहाँ उसने शिक्षण समाप्त कर दीक्षान्त समावर्तन प्रतिज्ञा के समय वह कहता है कि मैं राजा बनकर संसार को सुखधाम बनाऊँगा। उसको गुरु आचार्य बताते हैं कि तेरे तीनों बड़े भाई सन्यासी हुए तू क्यों नहीं होता।
परन्तु वह राज्य सम्बन्धी लाभों को जताकर उनकी एक चलने नहीं देता। तब उसके तीनों भाइयों ने आकर उसे समझाया, पर अकेले ही उसने तीनों को निरुत्तर कर दिया और अनेक प्रमाण और युक्तियों से सबको शास्त्रार्थ में परास्त किया। तब वे तीनों भाई हार मानकर कारण जानने के अर्थ अपनी माता के पास आये। और अति श्रद्धा से माता के चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना की, कि माता जी हम भी तीनों आपके पुत्र हैं जो एक दूसरे के पश्चात् सब सन्यासी हो गये और चौथा भी आपका ही
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्त
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