इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextपुत्र है जो बहुतेरा समझाने और शास्त्रार्थ करने पर भी सन्यासी नहीं हुआ, वरन् हम सबको परास्त कर राज्याधिकारी बनने के लिए घर आ गया। माता ने उन्हें धैर्य देकर समझाया कि आप ठहरेँ मैं आपको सन्तोष जनक उत्तर दूँगी और आपकी शंका का समाधान भले प्रकार करूँगी। फिर माता ने विधि पूर्वक तीनों का अतिथि सत्कार किया।
प्रातः जब वे शौच स्नान नित्य कर्म से निवृत्त हुए तो तीनों को एक विशाल भवन में जो वेद वेदांग त्याग वैराग्य आदि इसी प्रकार के सहस्रों ग्रन्थों से पूर्णित था साथ ले जाकर बिठला दिया कि आज आप इन ग्रन्थों का अवलोकन कीजिये और जो चित्र इसमें लटक रहे हैं उन्हें भी ध्यान से देखिये। वे चित्र सभी सन्यासियों, त्यागी, वैरागी, महान पुरुषों के जीवन चरित्र सहित थे। यह सब सारे दिन उन्हीं को देखते और विचारते रहे रात्रि में शयन किया। प्रातः निवृत्त होकर माता से पुनः कहा कि हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा शीघ्रता क्या है मैं उत्तर देने का वचन दे चुकी हूँ, आज तो और ठहरिये। माता ने उस दिन दूसरे भवन में जो नाना प्रकार के शस्त्रों अस्त्रों और सैनिक वीर पुरुषों योद्धाओं के चित्रों से शोभित था और उसमें अनेक ग्रन्थ राजनीति और शस्त्रादि, जल तथा आकाश यान बनाने की रीतियों से परिपूर्ण थे, जिसमें अस्त्र-शस्त्र बनाने चलाने व्यूह रचनायें और व्यूह आदि को खण्डित करने की क्रियाओं के साथ विद्यमान थीं लोजाकर बिठला दिया, और कहा कि आज का दिन इस भवन के चित्रों तथा ग्रन्थों के अवलोकन तथा मनन में व्यतीत कीजिये उन सबने वैसा ही किया। वह दिन भी समाप्त हो गया रात्रि को भोजनादि से निवृत्त होकर शयन कर प्रातःकाल उठे नित्य कर्म से निवृत्त हो माता से पुनः प्रश्न किया कि अब आप कृपया हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा कि मैं तो उत्तर दे चुकी। जब तुम तीनों मेरे गर्भ में थे और जब तक गुरुकुल नहीं
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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