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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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भेजा गया था मेरा सारा समय पहले कमरे में व्यतीत हुआ, वही दृश्य मेरे सामने रहे, उन्हीं ग्रन्थों को जो त्याग वैराग्य से भरपूर थे पढ़ा। उसी का तुम्हें उपदेश किया।

माता से बढ़कर अध्यापक और वेदों से बढ़कर ग्रन्थ संसार में कोई नहीं है। तो भला कैसे सम्भव था कि तुम सब सन्यासी न होते। जब तुम्हारा छोटा भाई सन्यासी हो गया। उस समय तुम्हारे पिता को खेद हुआ कि डम' वंश से राज्य जाता है और ही कोई राज्याधिकारी होगा और वंशोच्छेदन भी होता है। तब मैंने प्रतिज्ञा की कि अब मैं आपकी इच्छा पूर्ति के अर्थ एक और पुत्र उत्पन्न करने का कष्ट सहूँगी और उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि संसार में कोई भी बड़ी से बड़ी शक्ति उसे सन्यासी नहीं बना सकेगी। सो मेरा उस समय से गुरुकुल जाने पर्यन्त सारा समय इस दूसरे भवन में व्यतीत हुआ। इसलिए उस पर आपकी वा अन्य किसी की युक्तियाँ क्या प्रभाव डाल सकती थीं। यह कथा सुन तीनों भाई सावधान हो, चले गये और चौथा भाई राज्याधिकारी हुआ।

यवन शासक औरंगजेब का दरबार लगा हुआ है। अनेक वीर योद्धा राजपूत, पठान तथा मुगल आदि अपने अपने स्थानों पर मौन बैठे हैं। रोंब के कारण सब की दृष्टि भूमि की ओर झुकी हुई है। किसी में इतना साहस नहीं कि सर उठाकर देख सकें। हाँ! केवल एक वीर ऐसा है जो सर उठाए हुए बादशाह के पास ही एक कुर्सी पर बैठा है। उसकी मुद्रा से धैर्य, साहस और वीरता झलक रही है। तो दूसरी ओर खुशामदी टट्टू बैठे हैं। इस निर्भीक वीर का नाम है यशवन्तसिंह। जो सम्राट का दायी हाथ और साथ में हृदय का काँटा भी समझा जाता है।

कुछ कालान्तर के पश्चात् एक भयंकर सिंह दरबार में लाया गया। जिसे सम्राट ने पकड़वाकर मंगवाया था, सम्राट उसकी प्रशंसा के पुल बीधने लगे। दरबारी जन भी ही में ही मिलाने लगे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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