इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
Page 191 of 250
Read in contextअपने गुण कर्म स्वभाव से देश को उच्च शिखर पर पहुँचा देता है।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हैसमध्येबको यथा॥
चाणक्य नीति २/१२
अर्थ- वह माता शत्रु है और वह पिता वैरी है जिसने अपने बालकों को नहीं पढ़ाया। वह सभा के बीच में ऐसे ही सोहता है, जैसे हंसों के बीच बगुला।
विद्या वह गुप्त धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता तथा जो वितरण करने से कम नहीं होता परन्तु बढ़ता है। विद्या में कामधेनु के समान गुण हैं, क्योंकि कुसुमय में भी यह फल देती है और विदेश में यह माता के समान है। इसीलिए विद्या को गुप्त धन कहा गया है। जो माता-पिता अपनी सन्तानों के लिये बहुत-सा पार्थिव धन छोड़ जाते हैं। उनकी सन्तानें उस धन से कुमार्गी होकर धन तथा स्वास्थ्य को खो बैठती हैं। इसलिये माता-पिता को योग्य है कि यदि वह अपनी सन्तानों को सुयोग्य, सुकर्मों देखना चाहते हैं तो वह धन, सम्पत्ति की अपेक्षा विद्यारूपी गुप्त धन ही देकर जायें। क्योंकि मुद्रारूपी धन से भाई-भाई में वैमनस्य हो जाता है और विद्या रूपी धन से स्नेह, प्रीति और सहयोग होता है।
व्यवहार और कर्तव्य
यज्ञोऽनुत्तेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्।
आयुर्वि प्रापवादेन दान च परिकीर्तनात्॥
मनु ४/२३७
अर्थ- असत्य भाषण से यज्ञ नष्ट होता है, विस्मय से तप तथा ब्राह्मणों की निन्दा से आयु और चारों ओर कहने से दान घटता है।
इच्छानुसार सन्तान
१८५
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri