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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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हमारे दयामय पिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक वेद विद्यारूपी सूर्य प्रकाशित किया है और सबका आदिकरण परमात्मा है ऐसा अवश्य मानना चाहिए। ऐसे विद्या पुस्तक का भी आदिकरण ईश्वर को ही निश्चित मानना चाहिए, विद्या का उपदेश ईश्वर ने अपनी कृपा से किया है, क्योंकि हम लोगों के लिये उसने सब पदार्थों का दान दिया है तो विद्यादान क्यों न करेगा। सर्वोत्कृष्ट विद्या पदार्थ का दान परमात्मा ने अवश्य किया है तो वेद के बिना अन्य कोई पुस्तक संसार में ईश्वरोक्त नहीं है जैसा पूर्ण विद्यावान् और न्यायकारी ईश्वर है वैसा ही वेद पुस्तक भी है अन्य कोई पुस्तक ईश्वर कृत वेद तुल्य वा अधिक नहीं है।

बेटा! उस पारब्रह्म परमेश्वर के गुण गाओ साथ में उसे दिखाने वाले जगत गुरु ऋषिवर दयानन्द के ऋण को न भूलो। अब जाओ अपने माता-पिता से क्षमा माँगे और मेरा भोजन जिसे पाने के लिए मैं यहाँ आया था लाओ। सन्यासी जी भोजन पाकर चल दिए, सेठ जी के लाख कहने पर भी सन्यासी जी ने कुछ भी नहीं लिया और कहा मैंने तुमसे भोजन की भिक्षा माँगी थी उसे पा लिया और चले गये।

माता-पिता को बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बच्चे के माता-पिता ही सर्व प्रथम गुरु हैं। वह बच्चे में पाँच वर्ष की आयु तक जैसे संस्कार, विचार, भाव अपने व्यवहार द्वारा भर देते हैं वह अन्त तक विद्यमान रहते हैं। बच्चों पर माता पिता के व्यवहार, कृत्य, वातावरण, खान-पान, रहन-सहन आदि का तत्काल प्रभाव पड़ता है। इसलिए बच्चों का जीवन सफल बनाने के लिए अपने जीवन को सादा, सात्विक, धार्मिक और सत्य मय बनाना पड़ेगा, तभी सन्तान भी वैसी ही होगी। बुद्धिमान जन गुरु के द्वारा सन्तानों को सर्वदा नाना प्रकार के शुभ गुणों में लगावें। यदि वे विद्वान्, शीलवान्, गुणवान् हो जाते हैं। तो वह स्वयं पूजित होते हैं और उनके द्वारा देश जाति का गौरव ऊँचा होता है और

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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