इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextअर्थ- स्त्रियों का अलग कोई यज्ञ नहीं, न व्रत न उपवास केवल एक पति की शुश्रूषा से स्वर्ग में पूज्य हो जाती है।
पाणिग्रहस्थ साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।
पतिलोकम भीष्मन्ती नाचरेतिकञ्चदप्रियम्॥
मनु ५/१५६
अर्थ- पति की इच्छा करने वाली स्त्री जीवित या मृत पति को अप्रिय कोई कर्म न करे।
जिस समय श्री रामचन्द्र जी बन जा रहे थे उस समय उनकी माता कौशिल्या ने भी साथ बन चलने को कहा उस समय यह उपदेश रामचन्द्र जी ने अपनी माता को दिया था।
भर्तृः किल परित्राया नृशंसः केवलं स्त्रियाः।
स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विग्रहितः॥
वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड २०/१२
अर्थ- स्त्री के लिये पति का त्याग करना बड़ा निन्दित कर्म है, वह निन्दित कर्म आपको मन में भी नहीं लाना चाहिये।
यावज्जीवति काकृत्यस्थः पिता मे जगतीपतिः।
शुश्रूषा क्रियतां तावत्स हि धर्मः सनातनः॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/१३
अर्थ- जब तक मेरे पिता जीवित हैं तब तक आप उनकी सेवा करती रहें, यही प्राचीन धर्म है।
जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता देवतं प्रभुरेव च॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२१
अर्थ- स्त्री के जीते जी उसका पति ही उसका देवता और स्वामी है।
ब्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥
भर्तारं नानुवर्तत सातु पापगतिर्भवतु।
भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमृतम्॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२५, २६
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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