इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextअर्थ- कोई स्त्री कितनी श्रेष्ठ हो और चाहे नाना प्रकार के व्रत एवं उपवास करती हो, किन्तु यदि वह अपने पति की सेवा करती हुई उसकी अनुयायिनी नहीं होती तो वह नरक में जाती है। पति की सेवा से स्त्री उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करती है।
अपि या निर्गमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।
शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥
वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२७
अर्थ- वह चाहे किसी पूज्य को नमस्कार भी न करे और चाहे किसी देवता की पूजा तक भी न करे। अपने पति के प्रिय तथा हितकारी कार्य में तत्पर स्त्री स्वामी की सेवा ही करती रहे।
एषधर्मः पुरा दृष्टो लोके वेदे श्रुतः स्मृतः।
अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥
वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२८
अर्थ- स्त्रियों का यही धर्म प्राचीन काल से चला आ रहा है। यही वेद विहित है और यही लोक में प्रचलित है। हे माता जी! आप यहाँ मन लगा कर अग्निहोत्रादि, विद्वान् तथा व्रतशील ब्राह्मणों की सेवा करती रहें।
एक सन्यासी जंगल में तप कर रहे थे। एक दिन उनके ऊपर चिड़िया ने बीट कर दी सन्यासी ने क्रोधित हो चिड़िया की ओर देखा, देखते ही चिड़िया भस्म होकर भूमि पर गिर पड़ी। सन्यासी ने समझा कि अब मेरा तप पूर्ण हो गया। वह जब नगर में भिक्षा मांगने गये तो एक गृह पर जाकर भिक्षा माँगी, अन्दर से स्त्री ने कहा अभी आती है, कुछ देर बाद सन्यासी ने पुनः पुकारा तो अन्दर से ध्वनि आई अभी आती है, जब अन्दर से कोई नहीं आया तो सन्यासी ने पुनः पुकारा और अन्दर से ध्वनि आई, आती है, तत्काल एक स्त्री अन्दर से आटा लेकर आई, सन्यासी ने क्रोध की दृष्टि से स्त्री को देखा। स्त्री सन्यासी को क्रोधित देखकर कहने लगी, महाराज मैं वन की चिड़िया नहीं
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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