इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextमनुष्य
संसार के समस्त जीवधारियों में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म करने में स्वतंत्र और फल भोगने में परतंत्र है। बाकी जितने जीव हैं वह कर्म करने में स्वतंत्र नहीं, फल भोगने में स्वतंत्र हैं। अर्थात् मनुष्य योनि मुख्य रूप से कर्म करने के लिए है और योनिर्था मुख्य रूप से फल भोगने के लिए।
ते ह्यादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्।।
योगदर्शन २/१४
अर्थ- वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल को देने वाले होते हैं, क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पाप कर्म दोनों ही (पूर्वजन्म का) कारण हैं।
इसीलिए मनुष्य अपने कर्मों द्वारा ऊँचा उठ सकता है और कर्मों द्वारा नीचे भी गिर सकता है। संसार में कौन मनुष्य ऐसा है जो यश, कीर्ति और ऐश्वर्य नहीं चाहता हो। हर कोई चाहता है, कि मुझे यश प्राप्त हो, कीर्ति बढ़े और ऐश्वर्यशाली भी हूँ। पर वह यत्न करने पर भी नहीं हो पाता। क्योंकि उसे नहीं मालूम कि मुझे कौन-सा ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे यश और कीर्ति प्राप्त हो।
संसार में ईश्वर, जीव और प्रकृति अनदि हैं। जब मनुष्य प्रकृति की ओर अग्रसर होता है तो वह भोगवाद में अर्थात् सांसारिक माया जाल में फँस जाता है। तब उसे काम, क्रोध और मोह रूपी शत्रु घेर लेते हैं। जैसे ओइम् शब्द 'अ' 'उ' और 'म' से मिलकर बना है। 'अ' ईश्वर का द्योतक है। 'उ' जीव का और 'म' प्रकृति का द्योतक है। जब 'उ' रूपी जीव 'म' रूपी प्रकृति की ओर अग्रसर हो तो जीव अवनति को प्राप्त होता है, जैसे
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri