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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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अधिक बढ़ जाता है तो वह प्रमादी होकर मद्यपान, पर-स्त्री गमन आदि दोषों में प्रसित हो जाता है और उसी में उसका सर्वनाश भी हो जाता है। सच्चे देश भक्त श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में लिखते हैं- 'और यह संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है तब आलस्य, पुरुषार्थ रहितता, ईर्ष्या, द्वेष विषयासक्ति और प्रमाद बढ़ता है। इससे देश में विघ्ना सुशिक्षा नष्ट होकर दुर्गुण और दुष्ट व्यसन बढ़ जाते हैं।' क्योंकि जीवनेत्यान के लिए शास्त्रों ने चार शब्द कहे हैं। १. धर्म २. अर्थ ३. काम और ४. मोक्ष। जब मनुष्य इन चारों पदार्थों को साथ लेकर चलोगा तभी प्रमाद रहित होकर उत्तमता को प्राप्त हो सकेगा न कि बीच की दो बातों को लेकर (अर्थ और काम को)। अधिकांश मनुष्यों की धारणा है कि मनुष्य धन से ही बड़ा होता है। यह बात सत्य नहीं। ही धर्म के साथ धन ऐसा होता है जैसे सोने में सुगन्ध। जो मनुष्य यह विचारते हैं कि धन से ही मनुष्य बड़ा बनता है वह भ्रम में हैं देखो उन महापुरुषों को। क्या वह धन से बड़े बने अथवा कर्म से।

आपने बाल्मीकि ऋषि का नाम सुना है। जिन्होंने रामायण नाम का ग्रन्थ लिखा है। क्या वह धनी थे, यदि आप उनकी जीवनी उठाकर पढ़ें तो पता चलेगा कि वह पहले एक लुटेरे डाकू थे। जब उनका प्रारब्ध उदय हुआ तो उन्हें एक सन्यासी की संगत मिली और वह ऋषि पद पर पहुँच गये। अब आप कहेंगे कि उनके प्रारब्ध में ही ऐसा लिखा था इसलिए वह ऋषि बन गये। मेरे भाई! प्रारब्ध भी तो आप ही की कमाई है। मनुष्य जो कर्म आज करेगा वह कर्म कल संचित होकर प्रारब्ध रूप में सामने आयेगा। उसी को भाग्य और पिछले कर्म कहते हैं।

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनु गच्छति॥ १३/२४

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri