इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextआदि का रस, चिकने और शीतल पदार्थों का भोजन जल क्रीड़ा, खस के पंखों की पवन, चन्दन कपूर आदि का लेपन, दिन में १ घण्टा निद्रा और सुगन्धित पुष्पों का सेवन करना चाहिए। परन्तु इस ऋतु में कटु, तीक्ष्ण, नौन, खटाई, विदाही पदार्थ, मध्य श्रम और घूमना ये हानिकारक हैं।
वर्षा- इस ऋतु में वायु का कोप होता है इसलिए सैन्धव युक्त हर, चिकनी वस्तु, नौन, खटाई, चावल, साँठ, मिर्च काली, पीपल, पीपला मूल, चित्रक और सैन्धव युक्त, दही, उष्ण जल, कूप जल, श्वेत वस्त्र, भ्रमण हल्का भोजन और विरेचन करना चाहिए, परन्तु दिन में सोना श्रम, धूप तालाब का जल, दही, वन में निवास और विशेष मैथुन ये हानिकारक हैं।
शरद्- शरद् ऋतु में पित्त कृषित हो जाता है इसलिए मिश्री युक्त हर, सांठी चावल, मूंग, सरोवर का जल और औटे हुए दूध का सेवन करना चाहिए, परन्तु तीक्ष्ण वस्तु, खटाई, धूप में घूमना पूर्व दिशा की पवन लेना और दिन को सोना ये हानिकारक हैं।
हेमन्त- गौ तथा भैंस का नवीन घी, गुड़, सीठ युक्त हर्ष मीठा दही, तिल, गेहूँ, उर्द और मिश्री आदि मिष्ठान पदार्थ खाना नमक मिलाकर तेल मर्दन करना, निर्वात स्थानों में रहना नवीन गरम ऊन का वस्त्र पहनना चाहिए।
शिशिर-छोटी पीपल युक्त हर्ष, काली मिर्च, अदरक, नवीन घी, सैंधा नौन, उत्तम गुड़, दही भोजन तथा आहार विहार पूर्वोक्त लिखित सेवन करें।
उक्त ऋतुचर्या के नियमानुसार व्यवहार करने से ऋतु जन्य व्याधि का भय नहीं रहता। मनुष्यों को चाहिए कि इन नियमों से ऋतु पर्यन्त निर्वाह न कर सकें तो प्रत्येक ऋतु के अन्तिम सात दिन तक तो अवश्य ही नियम को पालें और आय दिन से अग्रिम ऋतुचर्या के आहार विहारों की ओर ध्यान देकर बर्ताव करें तो सर्वेव रोग रहित रहकर ऋतु जन्य व्याधियों के चक्र से विमुक्त रहेंगे।
| इच्छानुसार सन्तान | ३५ | वीरेन्द्र गुप्तः |
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