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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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एषां वै भूतानां पृथिवी रसः | ---|--- पृथिव्या | आपोऽपामोषधय औषधीनां | पुष्पाणि पुष्पाणां | फलानि फलानां | पुरुषः पुरुषस्य | रेतः ॥

ब्रह्मदर्पणकोपनिषद् ६/४/१

अर्थ- इन भूतों का रस (पंच भौतिक) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पों का रस फल है, फलों का रस (आधार) मनुष्य शरीर है तथा मनुष्य शरीर का रस (सार) शुक्र (वीर्य) है।

रसा इत्कं ततो मांसम्, मासात्, मेदः प्रजायते। मेद सोऽस्थि ततो मज्जा, मज्जाः शुक्रस्य सम्भवः ॥

भावप्रकाश पु- प्र- ६३

अर्थ- (जो मनुष्य अन्नादि खाता है) शरीर में प्रथम उसका रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा (मीग जो हड्डी के अन्दर होती है) और मज्जा से शुक्र (वीर्य) बनता है।

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वीर्य भोजनादि से किस प्रकार बनता है। एक दिन का खाया हुआ अन्न ४० वें दिन रस रक्त आदि बनता हुआ वीर्य रूप में आता है। एक बार वीर्य के पात में १ तोला वीर्य का क्षय होता है जो १ सेर रक्त का सार होता है। १ सेर रक्त ४० सेर अर्थात् १ मन अन्न जल के भोजन से बनता है। एक मन अन्न ४० दिन में एक मनुष्य खाता है इसका अभिप्राय यह है कि एक बार के वीर्य क्षय होने में ४० दिन के भोजन का सार रस शरीर से निकल जाता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri