इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextजाता है। यदि गर्भ नष्ट न हो और बच्चा उत्पन्न हो जाय तो वह अधिक समय तक जीवित नहीं रहता। यदि अधिक समय तक जीवित रह जाय तो वह दुर्बलीन्द्रिय होता है। अतः अपरिपक्व आयु की युवती से बच्चा उत्पन्न करने का प्रयत्न न होना चाहिए।
जब आम के नये वृक्ष पर मौल आता है तो माली ३ वर्ष तक उस मौल को तोड़ते रहते हैं। एक माली से मालमू किया कि आम के नये वृक्ष का मौल ३ साल तक क्यों तोड़ देते हैं? उसने कहा कि पुरखों से ऐसा ही चला आता है। पर जो वनस्पति विद्या के जानकार हैं वह कहते हैं कि यदि तीन वर्ष तक आम का मौल तोड़ दिया जायगा तो उस पर लगे फलों में कीड़े नहीं पड़ते और फल भी मीठा और बड़ा आवेगा। यह एक प्रत्यक्ष चमकता हुआ सर्वदेशीय नियम है, इसी नियम के ज्ञाता मनु भगवान ने लिखा है—
श्रीणि वषाण्युदीक्षेत कुर्मार्मृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु काला देतस्माहिन्देत सदृशं पतिम्॥
मनु १/१०
अर्थ— जब तीन वर्ष तक (अर्थात् छत्तीस बार) कन्या पिता के यहाँ रजस्वला हो ले तब अपने सदृश गुण वाले पति को प्राप्त होवे।
परो देहिं शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु।
कृत्येषा पद्मती भूत्वा जाया विशते पतिम्॥
ऋग्वेद १०/८५/२९
भावार्थ— जब स्त्री का विषाक्त शरीरस्थ मल का अंश दूर हो जाय तभी पुरुष के समीप जाना उचित है। अन्यथा स्त्री का विषाक्त पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर पुरुष को रोग युक्त बना देता है। अर्थात् जब तक ३६ बार रजोदर्शन द्वारा स्त्री का शरीर शुद्ध न हो जाय तब तक स्त्री से कभी समागम न करे। यदि इससे पूर्व समागम करेगा तो वीर्य सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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