इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextआश्चर्य चकित हो द्वार पर आये। देखा, भावी दामाद खड़े हैं। लाला श्यामलाल ने चकित होकर रात्रि के समय उपस्थित होने का कारण मालूम किया। उत्तर में वर ने कहा मैं लड़की देखने आया हूँ, मैंने वैसे तो लड़की की बहुत प्रशंसा सुनी है। माता-पिता प्रशंसा करते नहीं थकते। परन्तु फिर भी आप जानते हैं, अपनी-अपनी आँखें हैं और अपनी-अपनी पसन्द। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। हर्ज तो तब था जब पर्दे की प्रथा थी। क्योंकि कल को यदि न बने तो दोनों का जीवन नष्ट होने से बचा रहे। लाला श्यामलाल पुराने विचारों के पुरुष थे। उनके लिए प्रथा अटल नियम थी। उन्हें समाज का भय था। इसलिए उन्होंने पहले तो मना कर दिया और कहा मान लो मैंने तुम्हें लड़की दिखा दी और तुमने उसे पसन्द न किया तो क्या विवाह रुक जायगा? तुम कहोगे इसमें हनि ही क्या है। तुम्हारे लिए न होगी हमारी तो नाक कट जायगी। इन बातों का वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर ने कहा बिना देखे मैं विवाह न करूँगा, अब तो लाला श्यामलाल बड़ी विपत्ति में पड़ गए। बारत घर पर आ गई थी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में विवाह होना था, चार घण्टे का अन्तर। आखिर पिता ने लक्ष्मी को कमरे में बुला लिया। वर ने देखा वह वास्तव में वैसी ही सुन्दर है जैसी उसकी प्रशंसा सुनी थी। वर ने प्रश्न किया 'आप इग्लिश पढ़ी हैं?' लक्ष्मी ने संकोच से उत्तर दिया 'पढ़ी हैं'। लक्ष्मी के हाथ में अंग्रेजी का समाचार-पत्र देकर पढ़वाया। वह लक्ष्मी के उच्चारण और मधुर कण्ठ पर मुग्ध हो गए। लक्ष्मी ने संगीत में भी परीक्षा दी और उसमें भी उत्तीर्ण हो गई।
वर ने कहा- 'मुझे लड़की पसन्द है।' लक्ष्मी ने निश्चयात्मक रूप से कहा- 'परन्तु आप मुझे पसन्द नहीं।'
लक्ष्मी ने अपने उक्त शब्दों के समर्थन में जो कहा, वह एक सुशील भारतीय महिला के लिए उपयुक्त है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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