इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextही गर्भस्थ भ्रूण सन्तान के रूप में आकर, माता-पिता की आत्मा के बाहर ही रहता है।
बिना लक्ष्येण शुक्र दानम्।
संसार में कोई भी कार्य ऐसा नहीं, जिसे करने से पूर्व विचारा न जाय परन्तु गर्भाधान का कार्य ऐसा है जिसे बिना विचारों की आजकल किया जाता है।
आपके मन में आया चलो कुछ दिन के लिए कश्मीर की सैर कर आर्य, तत्काल ही दूसरा विचार उठा, वस्त्र नहीं हैं, पहले वस्त्र बनवा लें। वस्त्र बनाने का विचार आते ही आप बजाज की दुकान पर कपड़ा खरीदने चले आये। बजाज ने आपको कपड़ा दिखाने से पूर्व मालूम किया। महाशय जी क्या बनवाना है, तो आप उससे यह नहीं कहते कुछ बनवा लेंगे, तुम कपड़ा दे दो। परन्तु विचारते हो कश्मीर में ठण्ड पड़ती है, कोट नहीं है, कोट बनवाना है और कमीज भी, तो आप कहेंगे लाला जी कोट और कमीज का कपड़ा दिखाइये। अब समस्या हल हुई। इसी प्रकार कपड़ा लेकर जब आप दर्ज़ी के पास गये तो उसने भी प्रश्न किया कि क्या बनेगा तो आप उससे भी यही कहते हैं कि इसका कोट और इसकी कमीज और साथ में यह भी कि कोट अल्वर कट और कमीज टाई कालर की, ना कि यह कुछ सी दे। आपको कपड़ा लेने और दर्ज़ी के पास पहुँचने से पहले ही विचार करना पड़ता है। यही नहीं भोजन, यात्रा आदि सभी कार्यों के करने से पूर्व उसका विचार पहले मन में आता है फिर उसकी रूप-रेखा, तत्पश्चात्, वह कार्य क्रियात्मक रूप में आता है। परन्तु एक सन्तति निर्माण का कार्य ऐसा है कि इसमें न तो कोई पहले विचार करता है, न उसकी रूपरेखा बनाता है। तभी तो कह सकते हैं कि आजकल सन्तान उत्पन्न नहीं की जाती परन्तु हो जाती है। यदि वह सन्तान आपको कष्ट देती है तो उसे नालायक क्यों कहते हो, गलती आप करो और थोपो सन्तान के ऊपर। जब आपने
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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