इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextहोती है। भूमि तो उस बीज को जैसा उसमें बोया गया है उसे अपनी शक्ति से पोषण करती हुई उसी रूप में उत्पन्न कर देती है।
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जनक और जननी
ईश्वर, जीव और प्रकृति, यह तीनों अनादि हैं। इनका कभी नाश नहीं होता और न इनकी किसी ने रचना की है। यह सदा से अनादि हैं।
मृत्यु के पश्चात् जीव अन्तरिक्ष में चला जाता है। वायु द्वारा जीव मेघों में आकर जल वृष्टि द्वारा भूमि पर आता है। उस जल से अन्न में पहुँच कर भोजन द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर वीर्य में पहुँच जाता है।
जनक पिता को कहते हैं। क्योंकि जीव पहले पिता के वीर्य में पहुँच कर पोषित होता है। जननी माता का नाम है। जब पुरुष भोग द्वारा अपना वीर्य स्त्री के गर्भाशय में गिराता है तभी तो गर्भ स्थित होता है। तब वह जीव स्त्री के गर्भाशय में विकास को पाता हुआ समय आने पर बाहर आता है।
पुरुष हवा अयमादितो गर्भो भवति यदेतद्वेतः। तदेतत् सर्वैर्व्योडङ्ग स्युस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं विमर्ति तदा यदा स्त्रियां सिञ्च्यत्यथैनञ् जनयति तदस्य प्रथमं जन्म।
ऐतरेय उपनिषद् अ- २
अर्थ- वीर्य पुरुष के शरीर में पहला गर्भ होता है। यह समस्त शरीर का सार होता है। जब यह स्त्री के गर्भाशय में भेज दिया जाता है। तब इसका जन्म होता है।
तमागतं पृच्छति कोसीति। तं प्रतिब्रू यादविचक्षणा दूतवोरेत आभूत पंचदशान् प्रसूतात् पित्र्यावतसूतन् मा पुंसि कर्तरी एयाध्वं पुंसा कर्त्रा मातरिमा निषिञ्च सजाय उपजायमानो
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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