इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextद्वारशत्रयोदशोपमासे द्वारशत्रयोदशेन पित्रासं तद्विदिदेशुं प्रति तद्विदिदेशुं तन्मन्त्रतवोऽमुत्थव आमरध्व तेन सत्येन तेन तपसा ऋतु रसिम् आर्तवोऽरिम्।
काँचीतकी ब्राह्मणोपनिषद् अ १
अर्थ- जब ब्रह्मचार्यो आता है तो आचार्य पृष्ठता है 'तु कौन है?' ब्रह्मचार्यो उत्तर देता है 'शुक्ल और कृष्ण पक्षों के शासक चन्द्रमा से बीज एकत्र किया गया था जो प्रतिदिन के यज्ञ ने उत्पन्न हुआ था। यह यज्ञ देवों के द्वारा पुरुष में प्रविष्ट हुआ और उस पुरुष ने उसे स्त्री में प्रविष्ट किया उसी स्त्री से मेरा नाशवान् शरीर उत्पन्न हुआ है।'
'वह (जीव) पूर्व शरीर को छोड़ के वायु के साथ रहता है, पुनः जल औषधि वा प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है, तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर हो के पुनः जन्म लेता है।'
ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पुनर्जन्म अथवा हम पीछे लिख आये हैं कि भूमि की अपेक्षा बीज को महता अधिक है और भोजन से वीर्य किस प्रकार बनता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि अच्छी सन्तान प्राप्ति के लिए पहले माता-पिता को डेढ़ मास पूर्व से ही जिस प्रकार के बच्चे को जन्म देना हो उसी प्रकार के वातावरण भोजन, दिनचर्या आदि को अपने व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें। जिससे पुरुष के वीर्य में जो जीव है उसके संस्कार बनने प्रारम्भ हो जायें तथा पुष्ट भी होता रहे, क्योंकि हर वस्तु पर मन भावना तथा व्यवहार का तत्काल प्रभाव पड़ता है। साथ में जब तक भूमि भी पहले से जीत कर पटला आदि से तैयार नहीं कर ली जाती तब तक बीज को बीया नहीं जाता। इसी प्रकार स्त्री का रजः भी पुष्ट होकर अनुकूल भावना से संस्कृत हो जाय। क्योंकि बीज अपने पल्लवित काल में भूमि के प्रभाव से रचित नहीं रह पाता।
उच्छा-उत्तरा-सूक्तानि
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वीरेन्द्र गन्तः
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