जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context[ १५ ] विषय पृष्ठ १७०. ककण्टक जातक . . .. .. .. २१३ [ यह कथा महाउम्मग जातक (५४६) में है। ] ३. कल्याणधम्म वर्ग २१४ १७१. कल्याणधम्म जातक .. .. .. .. २१४ [ प्रव्रजित न होने पर भी घर के मालिक को प्रव्रजित हुआ समझ सभी रोने पीटने लगे। घर के मालिक को पता लगा तो वह सचमुच प्रव्रजित हो गया। ] १७२. दद्दर जातक .. .. .. .. २१७ [ नीच सियार का चिल्लाना सुन लज्जावश सिंह चुप हो गए । ] १७३. मक्कट जातक .. .. .. .. २२० [ बन्दर तपस्वी का भेष बनाकर आया था। बोधिसत्त्व ने उसे भगा दिया। ] १७४. दुब्भियमक्कट जातक .. .. .. .. २२३ [ तपस्वी ने बन्दर को पानी पिलाया। बन्दर अपने उपकारी पर पाखाना करके गया। ] १७५. आदिच्चुपट्ठान जातक .. .. .. .. २२५ [ बन्दर ने सूर्य्य की पूजा करने का ढोंग बनाया। ] १७६. कलायमुट्ठि जातक .. .. .. .. २२७ [ बन्दर का हाथ और मुंह मटर से भरा था, किन्तु वह उन सब को गंवा कर केवल एक मटर को खोजने लगा ।) १७७. तिन्दुक जातक .. .. .. .. २३० [ फल खाने जाकर सभी बन्दर फँस गए थे। गांव वाले उन्हे मार डालते। बोधिसत्त्व के सेनक नामक भानजे ने अपनी बुद्धि से सबको बचाया। ] १७८. कच्छप जातक .. .. .. .. २३३ [ जन्मभूमि के मोह के कारण कछुवे की जान गई। ]