जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextसुवण्णहंस ] ८६ उसे यह कहता सुन जो अप्पेच्छ भिक्षुणियां थी वह असन्तुष्ट हुई और उनमें सुनकर भिक्षु भी असन्तुष्ट हुए। उन्होंने खीझकर भगवान् से यह बात कही। भगवान् ने थुल्लनन्दा भिक्षुणी की निन्दा कर कहा— “भिक्षुओ, लालची (=महेच्छ) आदमी जिस मां ने जन्म दिया है, उसके लिए भी अप्रिय हो जाता है। वह अप्रसन्न को प्रसन्न नहीं कर सकता। प्रसन्नो को अधिक प्रसन्न नहीं कर सकता। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता। प्राप्त वस्तु को सँभाल कर नहीं रख सकता। अप्पेच्छ आदमी अप्रसन्नो को प्रसन्न कर सकता है। प्रसन्न को अधिक प्रसन्न कर सकता है। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त कर सकता है। प्राप्त वस्तु को बनाए रख सकता है।” —इस प्रकार भिक्षुओं को उनके योग्य उपदेश दे फिर कहा 'भिक्षुओ, थुल्ल नन्दा अभी लोभी नहीं है, पहले भी लोभी ही रही है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उनके बड़े होने पर उनके समान जाति-कुल से उन्हे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे नन्दा, नन्दवती और नन्दसुन्दरी तीन लड़कियाँ हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्त्व मर कर स्वर्ण- हंस होकर पैदा हुए। उन्हें पूर्व-जन्म-स्मृति का ज्ञान भी रहा। उसने बड़े होने पर सोने के परो से ढके हुए परम सौभाग्यवान् अपने शरीर को देखकर विचार किया कि मै कहाँ से मरकर यहाँ पैदा हुआ हूँ? उसे मालूम हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लडकियो का जीवन-यापन कैसे होता है ? उसे पता लगा कि दूसरो की मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती है। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस१ हैं। इनमें से में एक एक पर उन्हे दू। इस से मेरी भार्या और लड़कियाँ सुखपूर्वक जीएँगी।” वह यहाँ पहुँच घर के शहतीर के एक सिरे पर बैठ। ——— १कूटे और रगडे जा सकते हैं।