जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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ब्राह्मणी और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा—स्वामी, कहाँ से आए ? "मैं तुम्हारा पिता हूँ। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूँ। तुम्हें देखने के लिए आया हूँ। इसके बाद तुम्हे दूसरो की मजदूरी करते हुए कष्ट- पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नही है। में तुम्हें अपना एक एक पर दिया करूँगा। उसे बेच-वेच कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना।" इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार वह बीच बीच में आकर एक एक पर देता। ब्राह्मणियाँ धनी और सुखी हो गईं। एक दिन उस ब्राह्मणी ने लडकियो से बुलाकर सलाह की—'अम्म ! जानवरो के दिल का पता नही। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए। इसलिए उसके इस बार आने पर हम उसके सभी पर उखाड लें।' उन्होने अस्वीकार किया। वे बोली—इस प्रकार हमारे पिता को कष्ट होगा। ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-राजहंस के आने पर कहा—स्वामी आएँ। जब उसने देखा कि यह उसके पास आ गया है, तो दोनो हाथो से पकड़कर उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्त्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती लिए जाने के कारण बगले के पर सदृश हो गए। अब बोधिसत्त्व पक्ष पसारकर उड़ न सके। उसने उन्हें मटके में रखकर पाला। उनके जो नए पर निकले वह श्वेत ही निकले। पक्ष निकलने पर वह उड़कर अपने स्थान पर चले गए, और फिर वहाँ नही गए। शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात सुनाकर कहा—भिक्षुओ, थुल्लनन्दा अभी लालची नही रही है। पहले भी लालची रही है। लालच के ही कारण स्वर्ण से हाथ धोया। अब अपने लालच के कारण लहसुन से भी हाथ धोएगी। इसके बाद अब लहसुन खाना न मिलेगा। जैसे थुल्लनन्दा को वैसे ही उसके कारण दूसरी भिक्षुणियों को भी। इस लिए बहुत मिलने पर भी अपना । जानना चाहिए। थोडा मिलने पर जितना मिले उसी से सन्तोष ना चाहिए। अधिक की इच्छा नही करनी चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—