जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextचुहिया बोली—अरे दुष्ट बिलार ! क्या मैं तेरी नौकर हूँ कि मांस लाकर दूँ । अपने पुत्रों का मांस खा । बिल्ला नहीं जानता था कि चुहिया स्फटिक गुहा के अन्दर है । उसने क्रोध से सहसा आक्रमण किया कि चुहिया को पकडूंगा । उसका हृदय स्फटिक गुहा से टकराया और उसी समय चूर चूर हो गया । आंखें निकल आईं सी हो गईं । वह वही मरकर एक छिपे हुए स्थान पर गिरा । इस प्रकार दूसरे चार जने भी मृत्यु को प्राप्त हुए । उसके बाद से चुहिया निर्भय हो गई । वह बोधिसत्त्व को प्रतिदिन दो तीन कार्षापण देती । इस प्रकार उसने सारा धन बोधिसत्त्व को ही दे दिया । वे दोनो जीवन भर मित्र-भाव से रह यथाकर्म (परलोक) सिधारे । शास्ता ने यह पूर्वजन्म की कथा कह सम्यक् सम्बुद्ध हुए रहने पर यह गाथा कही— यत्थेषो लभते बब्बु दुतियो तत्थ जायति, ततियो च चतुत्थो च इदं ते बब्बुका बिलं ॥ [ जहाँ एक बिल्ले को (मांस) मिलता है दूसरा वही जाता है । तीसरा भी वही जाता है और चौथा भी वही । हे बिल्ले ! यह तेरा बिल¹ है । ] यत्थ जिस जगह । बब्बु, बिल्ला । दुतियो तत्थ जायति, जहां एक को चुहिया अथवा मास मिलता है, दूसरा बिल्ला भी वही जाता है । वैसे ही ततियो च चतुत्थो च, इस प्रकार वहाँ चार बिल्ले हुए । वे दिन प्रति दिन मास खाते हुए । ते बब्बुका इदं स्फटिक का बना हुआ बिल पेट में गड़ाकर सभी मर गए । इस प्रकार शास्ता ने धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया । उस समय के चारो बिल्ले चार भिक्षु हुए । चुहिया काण-माता हुई । पत्थर तराशनेवाला जौहरी तो मैं ही था । ¹ प्रतीत होता है कि यह गाथा चुहिया द्वारा कही गई थी । इस में 'बिल' शब्द का अर्थ 'हिस्सा' होना चाहिए । जातककार ने यह गाथा बुद्ध-भाषित बनाई है; और बिल का जो अर्थ किया है वह मेल नहीं खाता ।