भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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९४ [ १.१४.१३७ एक दिन उस चुहिया को बिल्ले ने पकड़ लिया । वह बोली—स्वामी ! मुझे न मारें।" "क्यो ? मुझे भूख लगी है ! मै मास खाना चाहता हूँ । मैं बिना मारे नही रह सकता ।" "क्या केवल एक दिन एक ही बार मास खाना चाहते है, अथवा नित्य प्रति ?" "मिले तो नित्य खाना चाहूँगा ।" "यदि ऐसा है, तो मुझे छोड़ दें । मै नित्य प्रति मांस दिया करूँगी ।" "अच्छा तो ध्यान रखना" कह बिल्ले ने उसे छोड़ दिया । उसके बाद से उसके लिए जो मास आता उसके वह दो हिस्से करके एक बिल्ले को देती एक स्वयं खाती । फिर एक दिन उसे एक दूसरे बिल्ले ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने आप को छुड़ाया । उसके बाद से तीन हिस्से करके खाने लगी । फिर एक और ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने को छुड़ाया उसके बाद से चार हिस्से करके खाने लगी । फिर एक ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह समझाकर अपने को छुड़ाया । उसके बाद से पाँच हिस्से करके खाने लगी । केवल पाँचवाँ हिस्सा मिलने से यह चुहिया आहार की कमी से म्लान तथा कृश हो गई । उसका मांस और रक्त कम पड़ गया । बोधिसत्त्व ने उसे देखकर पूछा—"अम्म ! म्लान क्यो पड़ गई है ?" "इस कारण से ।"