जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextगोध ] ६७ तपस्वी ने गोह का मांस खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । उसने पूछा —यह मांस बड़ा मीठा है। किसका मांस है ? जब उसे पता लगा कि किसका मांस है, तो वह सोचने लगा कि मेरे पास बड़ी गोह आती है । उसे मारकर उसका मांस खाऊँगा । उसने पकाने के बरतन और उनके साथ घी, नमक आदि मँगवा कर एक ओर रख लिए। स्वयं मुद्गर ले काषाय वस्त्र से ढँक पर्ण-कुटी के सामने शान्त-चित्त की तरह बैठ बोधिसत्त्व की प्रतीक्षा करने लगा। बोधिसत्त्व शाम को तपस्वी के पास जाने के लिए निकले। समीप पहुँचते ही उसकी इन्द्रियों में विकार देखकर सोचने लगे—यह तपस्वी उस तरह नहीं बैठा है जैसे और दिनों बैठा रहता था। आज यह मेरी ओर द्रूषित दृष्टि से देख रहा है। इसकी परीक्षा करूँगा । वे जिधर से तपस्वी की देह को छूकर हवा आ रही थी उधर खड़े हुए । गोह के मांस की गन्ध आई । उसे सूंघकर बोधिसत्त्व ने सोचा—इस कुटिल तपस्वी ने आज गोह मांस खाया होगा । इसी से यह रस-तृष्णा में आसक्त हो गया । आज मेरे समीप पहुँचने पर मुझे मुद्गर से मार मांस पकाकर खाना चाहता होगा । वह उसके पास न जा वापिस लौटकर घूमने लगे । तपस्वी ने बोधिसत्त्व को न आता देख समझा कि यह जान गया होगा कि मैं इसे मारना चाहता हूँ । इसी से नहीं आता है । न आने पर भी यह कहाँ बचकर जाएगा । उसने मुद्गर निकाल फेंककर मारा । वह उसकी पूँछ के सिरे में ही लगा । बोधिसत्त्व जल्दी से बिल में प्रविष्ट हो दूसरे छेद से सीस निकालकर बोले —'कुटिल जटिल ! मैं तुझे सदाचारी समझ कर तेरे पास आया । लेकिन अब मैंने तेरा कुटिल स्वभाव जान लिया । तेरे जैसे महाचोर को इस प्रव्रजित भेष से क्या ?'' इस प्रकार उसकी निन्दा करते हुए यह गाथा कही— किं ते जटाहि दुम्मेध किं ते अजिन साटिया, अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१ १ धम्मपद (२६।२२) ७