जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context३८ [ १.१४ १३६ [हे दुर्बुद्धि ! जटाओ से तुझे क्या (लाभ) ? और मृगचर्म के पहनने से क्या ? अन्दर से तो तू मैला है, बाहर से धोता है।] किं ते जटाहि दुम्मेध, भो, दुर्बुद्धि ! मूर्ख ! यह जटाएँ प्रव्रजित को धारण करनी चाहिएँ। प्रव्रज्या गुण से तू रहित है। तुझे इन जटाओ से क्या लाभ ? किं ते प्रजिन साटिया, मृग-चर्म के अनुकूल सयम का अभाव है, तब इस मृग-चर्म से क्या ? अब्भन्तर ते गहन—तेरा भीतर राग, द्वेष तथा मोह से मलिन है, ढका हुआ है। बाहिर परिमज्जसि, सो तू अभ्यन्तर को मैला ही रख स्नान आदि से तथा (श्रमण-) चिह्न धारण करके बाहर को साफ करता है। तू वैसा ही है जैसे वाञ्जी से भरा हुआ तूम्बा हो, विष से भरा घडा हो, साँप से भरी हुई वाँवी हो अथवा गूढ़ से भरा हुआ चित्रित घडा हो। तुझ चोर के यहाँ रहन से क्या ? शीघ्र भाग । यदि नही जाएगा तो ग्रामवासियो को कहकर तेरा निग्रह करवाऊँगा। इस प्रकार बोधिसत्त्व उस कुटिल तपस्वी को धमकाकर बिल में चले गए। कुटिल तपस्वी भी वहाँ से चला गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय कुटिल तपस्वी यह ढोंगी था। पहला शीलवान् तपस्वी सारिपुत्र था। गोधपण्डित तो मैं ही था। १३६. उभतोभट्ठ जातक "अवस्सो भित्तो पटो नष्टो . ." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे म कही।