जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextवह पीडा से पगला हो हाथ से आंखो को दबाए हुए पानी से बाहर निकल कांपता हुआ कपडे खोजने लगा। उसकी भार्या ने भी सोचा कि मे झगडा करके ऐसा कर दूं कि कोई कुछ आशा न रक्खे। उसने एक कान में ताड का पत्ता पहना, एक आंख में हांडी का काजल लगाया और गोद में कुत्ता ले पडोसी के घर गई। उसकी एक पडोसन बोली—"तूने एक ही कान में ताड का पत्ता डाला है, एक ही आंख में कज्जल लगाया है और गोद में कुत्ते को ऐसे लेकर जैसे यह तेरा प्यारा पुत्र हो एक घर से दूसरे घर घूम रही है। क्या तू पगली हो गई है ?" "मै पगली नही हूँ ? तू मुझे व्यर्थ ही गाली देती है, मजाक करती है। अब में मुखिया¹ के पास जाकर तुझपर आठ कार्षापण जुर्माना करवाऊँगी।" इस प्रकार परस्पर झगडकर दोनो मुखिया के पास गईं। दोषी का पता लगाने से वही दण्डित हुई। लोग उसे बांधकर पीटने लगे कि जुर्माना दे। वृक्षदेवता ने गांव मे उसका यह हाल और जगल में उसके पति की विपत्ति को देख एक टहने पर खडे होकर कहा—भो ! पुरुष ! जल में भी तेरा काम बिगडा, स्थल पर भी। तू दोनो ओर से भ्रष्ट होगया। इतना कह यह गाथा कही— अक्खी भिन्ना पटो नट्ठो सखीगेहे च भण्डन, उभतो पदुट्ठकम्मन्तो उदकम्हि थलम्हि च ॥ [ आंख फूट गई। वस्त्र खोया गया। सखी के घर में झगडा हुआ। जल और स्थल दोनो ही में तेरा काम बिगड गया।] सखीगेहे च भण्डन, सखी का मतलब है सहायिका, उसके घर में तेरी भार्या न झगडा किया। झगडा करके बांधी गई, पीटी गई और दण्डित हुई। उभतो पदुट्ठ कम्मन्तो, इस प्रकार दोनो जगह में तेरा काम बिगडा ही। कौन से दो स्थानो में ? उदकम्हि थलम्हि च, आँख फूटने से और वस्त्र नष्ट ¹ ग्रामभोजकं ।