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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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काक ] १०३ उसके बाद से कौवे मारे जाने लगे, और चर्बी न पाकर जहाँ तहाँ उनका ढेर लगाया जाने लगा। कौवो पर वडी भारी विपत्ति आई। उस समय बोधिसत्त्व अस्सी हजार कौओ के साथ महाश्मशान वन में रहते थे। एक कौये ने जाकर वोधिसत्त्व को कौओ पर आई विपत्ति का समाचार कहा। उसने सोचा--'मेरे अतिरिक्त कोई मेरी जातिवालो के दुख को दूर नहीं कर सकता। मै दूर करूँगा।" बोधिसत्त्व दस पारमिताओं का ख्यालकर, मैत्री पारमिता को प्रमुख कर एक ही उडान में उड खुले हुए बडे रोशनदान में प्रविष्ट हो राजा के आसन के नीचे जा बैठे। उन्हें एक मनुष्य पकडने लगा। राजा ने रोका—शरण में आए को मत पकडो। बोधिसत्व ने थोडा विश्राम ले मैत्री-पारमी का ध्यान कर आसन के नीचे से निकल राजा से कहा—महाराज ! राजा को चाहिए कि यह उत्तेजना के वशीभूत होकर राज्य न करे। जो भी कार्य करना हो वह सोच विचार कर करना चाहिए। जो करने से हो सके, वही कार्य करना चाहिए, दूसरा नहीं। यदि राजा ऐसा कार्य करते हैं जिसका कोई फल नहीं होता तो यह जनता के लिए मरण होता है, महान् भय का कारण होता है। पुरोहित ने बैर के वश हो झूठ कहा है। कौओ को चर्बी होनी ही नही। राजा प्रसन्न हुआ। उसने बोधिसत्व को सोने का सुन्दर पीढा दिया। वहाँ बैठने पर उसके परो को सौ-पाक सहस्र-पाक तैल लगवाया। सोने के थाल में राज-भोजन दिलवाया। पानी पिलवाया। अच्छी तरह से खा चुकने पर जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे तब राजा ने पूछा—"पण्डित, तू कहता है, कौवो को चर्बी नही होती। उनको चर्बी क्यो नही होती ?" बोधिसत्त्व ने इन इन कारणो से नही होती बताते हुए सारे घर को अपने शब्द से गूंजाते हुए धर्म-कथा की, और यह गाथा कही— निच्च उब्बिग्गहृदया सब्बलोकविहेसका, तस्मा तेसं वसा नत्थि काकानस्माकञातिन ॥ [हृदय नित्य उद्विग्न रहता है। सारे ससार को कष्ट देते हैं। इसलिए ५जा ' हमारी जाति के लोग—जो कौए हैं—चर्बी-रहित होते हैं।]