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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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१०४ [ १.१४.१४० ] महाराज ! कौवे सदैव उद्विग्न हृदय होते है, भयभीत ही विचरते है। सारे संसार को कष्ट देते है—क्षत्रिय आदि को भी, स्त्री-पुरुष को भी, लडके लडकियो को भी—सभी को तकलीफ पहुँचाते है। इसलिए इन दो कारणो से हमारे जातिवालो को चर्बी नही होती। पहले भी नही हुई। आगे भी नहीं . होगी। इस प्रकार बोधिसत्व ने यह बात स्पष्ट कर राजा को समझाया— महाराज ! राजा किसी भी बात को बिना सोचे-विचारे नही करते । राजा ने प्रसन्न हो राज्य बोधिसत्त्व को भेंट किया। बोधिसत्त्व ने राज्य राजा को लौटा दिया। फिर उसे पञ्चशीलो में प्रतिष्ठित कर उससे सभी प्राणियो को अभय-दान देने के लिए कहा। राजा ने धर्मोपदेश सुन सभी प्राणियो को अभय-दान दे कौओ के लिए नित्य-भोजन बाँध दिया। प्रतिदिन अम्मण भर चावल का भात पकाकर नाना प्रकार के रसो से मिलाकर कौओ को दान दिया जाता। बोधिसत्त्व को राज-भोजन ही मिलता। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी राजा आनन्द था। कौओ का राजा तो मै ही था।