जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१०६ [ १.१५ १४१ जब बोधिसत्त्व के बार बार कहने से भी उनकी मित्रता जैसी की तैसी रही, तब बोधिसत्त्व ने सोचा कि इस गिरगिट के कारण हमको अवश्य खतरा होगा । खतरे के समय के लिए भागने का मार्ग तैयार होना चाहिए । उसने एक तरफ हवा आने का रास्ता बनवा लिया । बोधिसत्त्व का पुत्र भी शनै शनै बडे शरीर वाला हुआ, गिरगिट पहले ही जितना रहा । वह समय समय पर उसका आलिङ्गन करने के लिए गिरगिट पर आ पडता । गिरगिट को ऐसा मालूम देता कि मानो उस पर पर्वत आ पडा है । उसने कष्ट पाते हुए सोचा कि यदि यह और कुछ दिन इस प्रकार मेरा आलिङ्गन करता रहा तो मैं जीवित नही रहूँगा । इसलिए किसी शिकारी के साथ मिलकर इस गोह-कुल को ही नष्ट करवाऊँ । एक दिन ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने पर बांबी से मक्खियाँ निकलीं । जहाँ तहाँ से गोह निकलकर मक्खियो को खाने लगे । एक गोह-शिकारी गोह के बिल को फाडने के लिए कुदाल और कुत्ते साथ में ले जगल में घूम रहा था । गिरगिट ने उसे देखकर सोचा कि आज अपना मनोरथ पूरा करूँगा ? उसने पास आ, थोडी दूर पर ठहर पूछा—हे ! पुरुष ! जगल में क्यो घूम रहे हो ?" उसन कहा—गोहो के लिए । गिरगिट बोला—"मै कई सौ गोहो का निवास- स्थान जानता हूँ । आप आग और पुआल लेकर आएँ ।" उसे वहाँ ले जाकर कहा, "यहाँ पुआल रख, आग लगाकर धुआँ करें। चारो तरफ कुत्तों को बिठाएँ। अपने आप मुद्गर लेकर बैठें । जो जो गोह निकले उन्हें मार मारकर ढेर लगाएँ फिर स्वय एक जगह पर सिर उठाकर पड रहा—आज शत्रु की पीठ¹ देखने को मिलेगी । शिकारी ने पुआल का धुआँ किया । धुआँ बिल में घुसा । गोह जब धुएँ से अधे हुए तब मृत्यु भय से भयभीत हो भागने लगे । शिकारी ने जो जो गोह निकले उन्हें मारा । उसके हाथ से बच्चो को कुत्तो ने लिया । गोहो के लिए महाविनाश उपस्थित हुआ । ¹शत्रु की पीठ देखना मिलने का भावार्थ है पलायन; यहा विनाश से तात्पर्य्य है ।