जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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बोधिसत्त्व को मालूम हुआ कि गिरगिट के कारण महान् खतरा पैदा हो गया । वह सोचने लगे कि पापी का साथ नहीं ही करना चाहिए । पापी की संगत से सुख नहीं हो सकता । एक पापी गिरगिट के कारण इतने गोह नाश को प्राप्त हुए । इस प्रकार सोचते हुए हवा आने के बिल से भागते हुए यह बात कही— न पापजनससेवी अच्छन्तसुखमेधति, गोधाकुलं कक्कटाव कलिं पापेति अत्तान ॥ [ पापी की संगत करने वाले को निरन्तर सुख कभी नही मिलता । जैसे गिरगिट के कारण गोह-कुल नष्ट हुआ, इसी प्रकार वह अपना विनाश करता है । ]
पापजनससेवी, (पापी की संगत करनेवाला) आदमी अच्छन्तसुख, केवल सुख ही सुख वा निरन्तर सुख न एधति, नहीं प्राप्त करता, जैसे क्या ? गोधा कुल ककण्टाव, जैसे गिरगिट से गोह-कुल को सुख नहीं मिला । इसी प्रकार पापी जन की संगत करनेवाले को सुख नहीं मिलता । पापी जन की संगत करने वाला निश्चय से कलिं पापेति अत्तान, कलि कहते हैं विनाश को, पापी जन की संगत करने वाला निश्चयपूर्वक अपने को और अपने साथ रहने वालो को नष्ट करता है । पालि में फल पापेति पाठ है । वह पाठ अट्ठकथा में नहीं है । उस अर्थ का भी यहाँ मेल नहीं बैठता । इसलिए जैसे यहाँ कहा गया, वैसे ही ग्रहण करना चाहिए ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय गिरगिट देवदत्त था । बोधिसत्त्व का पुत्र उपदेश न माननेवाला गोह पिल्ला विपक्ष-सेवी भिक्षु था । गोह-राज तो मैं ही था ।