जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१०८ [ १.१५.१४२ १४२. सिगाल जातक “एत हि ते दुराजानं...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के (तथागत को) मारने का प्रयत्न करने के बारे में कही। क. वर्तमान कथा धर्म-सभा में भिक्षुओ की बातचीत सुनकर तथागत ने कहा—भिक्षुओ ! देवदत्त ने केवल अभी मेरे वध की कोशिश नहीं की। पहले भी की ही है। लेकिन मुझे मार नहीं सका। स्वयं ही दुखी हुआ। यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व गीदड होकर पैदा हुए। वह शृगाल-राजा बन शृगाल गण सहित श्मशान में रहने लगे। उस समय राजगृह में उत्सव था। अधिकांश मनुष्य सुरा पीते थे, वह था ही सुरा-उत्सव। अनेक धूर्त बहुत सी सुरा और मांस ले आए, और मस्त होकर सुरा पीने तथा मांस खाने लगे। रात्रि के पहले पहर मे ही उनका मांस समाप्त हो गया, सुरा तो बहुत थी। एक बोला—“मांस का टुकडा दो।” दूसरे ने कहा—“मांस तो समाप्त हो गया।” "मेरे खडे रहते कही मांस समाप्त हो सकता है ?" 'यह उसने सोचा कि कच्चे श्मशान में मृत मनुष्यो को खाने के लिए आए हुए शृगालो को मारकर मांस लाऊँगा। वह एक मोगरी ले नाली के रास्ते शहर से निकल श्मशान म जा मोगरी सहित मृतक की तरह सीधा ही लेट रहा।