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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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विरोचन ] १११

आलस्य रहित हैं। तुम भिक्षु-गण को कुछ धर्मोपदेश करो। मेरी पीठ में दर्द होता है। मैं इसे जरा तानूँगा। इतना कह देवदत्त सो गया। दोनो अग्रश्रावक उन भिक्षुओं को धर्मोपदेश दे (आर्य-) मार्ग और फल¹ के प्रति उनका ध्यान जागृत कर सभी को वेणुवन साथ ले गए। कोकालिक ने जब देखा कि विहार खाली हो गया तब वह देवदत्त के पास गया और बोला—"आयुष्मान् देवदत्त ! तेरे अनुयायियों में भेद पैदा कर अग्रश्रावक तेरा विहार खाली कर चले गए। तू पड़ा सो ही रहा है।" उसने उसकी चादर हटा दीवार में कील ठोकने की तरह उसकी छाती में एड़ी से एक ठोकर लगाई। उसी समय उसके मुंह से खून गिर पड़ा। उसके बाद से वह रोगी हो गया। शास्ता ने स्थविर से पूछा—सारिपुत्र ! तुम्हारे जाने के समय देवदत्त ने क्या किया ? "भन्ते ! हमें देखकर देवदत्त ने सोचा कि बुद्ध की तरह व्यवहार करूँगा। बुद्ध की नकल करता हुआ वह विनाश को प्राप्त हुआ।" "सारिपुत्र ! देवदत्त केवल अभी मेरी नकल करने जाकर विनाश को प्राप्त नहीं हुआ, पहले भी हुआ है।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व केसरी (सिंह) होकर पैदा हुए और हिमालय की कञ्चनगुफा में रहने लगे। एक दिन वे कञ्चनगुफा से निकल जम्भाई ले, चारो दिशाओं की ओर नजर उठा, सिंहनाद कर शिकार के लिए निकले। उन्होंने एक बड़े भारी भैंसे को मारा। उसका मांस खाया। फिर एक तालाब में उतर मणि-वर्ण जल की डोल पूर्ण करते हुए की तरह गुफा की ओर प्रस्थान किया।


¹ श्रोतापत्ति मार्ग आदि चार आर्य-मार्गों के चार फल।